श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 11: युद्ध बन्द करने के लिए  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  4.11.25 
स एव विश्वं सृजति स एवावति हन्ति च ।
अथापि ह्यनहङ्कारान्नाज्यते गुणकर्मभि: ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
ईश्वर ही इस भौतिक जगत का निर्माण, पालन और विनाश करते हैं, परन्तु अपने आध्यात्मिक स्वरूप से परे रहने के कारण, वे इन कार्यों में न तो अहंकार से प्रभावित होते हैं और न ही भौतिक प्रकृति के गुणों से।
 
ईश्वर ही इस भौतिक जगत का निर्माण, पालन और विनाश करते हैं, परन्तु अपने आध्यात्मिक स्वरूप से परे रहने के कारण, वे इन कार्यों में न तो अहंकार से प्रभावित होते हैं और न ही भौतिक प्रकृति के गुणों से।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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