श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 11: युद्ध बन्द करने के लिए  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  4.11.20 
न वै स्वपक्षोऽस्य विपक्ष एव वा
परस्य मृत्योर्विशत: समं प्रजा: ।
तं धावमानमनुधावन्त्यनीशा
यथा रजांस्यनिलं भूतसङ्घा: ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
अपने शाश्वत काल स्वरूप में श्रीभगवान इस भौतिक जगत में विराजित हैं और उनका सभी के प्रति समान व्यवहार है। उनका कोई मित्र नहीं है और न कोई शत्रु है। समय तत्व के प्रभाव में हर कोई अपने कर्म या कामों के परिणाम का आनंद लेता है या भुगतता है। जिस प्रकार हवा चलने पर धूल के छोटे-छोटे कण हवा में उड़ते हैं, उसी प्रकार अपने कर्म के अनुसार व्यक्ति भौतिक जीवन का सुख या दुख का अनुभव करता है।
 
अपने शाश्वत काल स्वरूप में श्रीभगवान इस भौतिक जगत में विराजित हैं और उनका सभी के प्रति समान व्यवहार है। उनका कोई मित्र नहीं है और न कोई शत्रु है। समय तत्व के प्रभाव में हर कोई अपने कर्म या कामों के परिणाम का आनंद लेता है या भुगतता है। जिस प्रकार हवा चलने पर धूल के छोटे-छोटे कण हवा में उड़ते हैं, उसी प्रकार अपने कर्म के अनुसार व्यक्ति भौतिक जीवन का सुख या दुख का अनुभव करता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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