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श्लोक 4.11.2  |
सन्धीयमान एतस्मिन्माया गुह्यकनिर्मिता: ।
क्षिप्रं विनेशुर्विदुर क्लेशा ज्ञानोदये यथा ॥ २ ॥ |
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| अनुवाद |
| ध्रुव महाराज ने जैसे ही अपने धनुष पर नारायणास्त्र को चढ़ाया, त्योंही यक्षों की माया तुरंत खत्म हो गई—ठीक वैसे ही जैसे आत्मा के ज्ञान के होते ही भौतिक सुख-दुख मिट जाते हैं। |
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| ध्रुव महाराज ने जैसे ही अपने धनुष पर नारायणास्त्र को चढ़ाया, त्योंही यक्षों की माया तुरंत खत्म हो गई—ठीक वैसे ही जैसे आत्मा के ज्ञान के होते ही भौतिक सुख-दुख मिट जाते हैं। |
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