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श्लोक 4.11.17  |
निमित्तमात्रं तत्रासीन्निर्गुण: पुरुषर्षभ: ।
व्यक्ताव्यक्तमिदं विश्वं यत्र भ्रमति लोहवत् ॥ १७ ॥ |
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| अनुवाद |
| मेरे प्रिय ध्रुव, भगवान् प्रकृति के गुणों से कलुषित नहीं होते हैं। वो इस भौतिक जगत की उत्पत्ति के मूल कारण हैं। जब वो प्रेरणा देते हैं, तब कई अन्य कारण और परिणाम उत्पन्न होते हैं और तब सारा ब्रह्मांड उसी तरह घूमता है जैसे कि लोहा एक चुंबक की सम्मिलित शक्ति से घूमता है। |
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| मेरे प्रिय ध्रुव, भगवान् प्रकृति के गुणों से कलुषित नहीं होते हैं। वो इस भौतिक जगत की उत्पत्ति के मूल कारण हैं। जब वो प्रेरणा देते हैं, तब कई अन्य कारण और परिणाम उत्पन्न होते हैं और तब सारा ब्रह्मांड उसी तरह घूमता है जैसे कि लोहा एक चुंबक की सम्मिलित शक्ति से घूमता है। |
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