श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 11: युद्ध बन्द करने के लिए  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.11.17 
निमित्तमात्रं तत्रासीन्निर्गुण: पुरुषर्षभ: ।
व्यक्ताव्यक्तमिदं विश्वं यत्र भ्रमति लोहवत् ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
मेरे प्रिय ध्रुव, भगवान् प्रकृति के गुणों से कलुषित नहीं होते हैं। वो इस भौतिक जगत की उत्पत्ति के मूल कारण हैं। जब वो प्रेरणा देते हैं, तब कई अन्य कारण और परिणाम उत्पन्न होते हैं और तब सारा ब्रह्मांड उसी तरह घूमता है जैसे कि लोहा एक चुंबक की सम्मिलित शक्ति से घूमता है।
 
O Dhruva, the Lord is not contaminated by the modes of nature. He is the remote cause (nimitta) of the origin of this material cosmic manifestation. By His inspiration many other causes and effects are generated and then this entire universe rotates just as iron rotates by the accumulated power of a magnet.
तात्पर्य
भौतिक जगत में भगवान की बाह्य उर्जा कैसे काम करती है इस बात को इस श्लोक में दर्शाया गया है | भगवान की उर्जा से ही सब कुछ घटित हो रहा है | जो नास्तिक दार्शनिक भगवान को सृष्टि के मूल कारण के रूप में मानने को तैयार नहीं है, उनका मानना है कि भौतिक जगत अलग अलग भौतिक तत्वों की क्रिया-प्रतिक्रिया से चलता है | तत्वों की पारस्परिक क्रिया का एक सरल उदाहरण तब घटित होता है जब हम सोडा और एसिड को मिलाते है जिससे फुफकार और उफान उत्पन्न होता है | लेकिन रासायनिक तत्वों की क्रिया-प्रतिक्रिया से जीवन नहीं बनाया जा सकता | जीवन की लगभग 84,00,000 विभिन्न प्रजातिया है, जिनकी भिन्न भिन्न इच्छाएँ और क्रियाएँ होती है | भौतिक तत्व किस प्रकार काम कर रहे है, सिर्फ रासायनिक प्रतिक्रिया के आधार पर उसको नहीं समझाया जा सकता | इस संदर्भ में एक उपयुक्त उदाहरण कुम्हार और चाक का है | कुम्हार का चाक घूमता है, जिससे कई प्रकार के मिटटी के बर्तन बनकर निकलते है | मिटटी के बर्तन बनने के कई कारण होते है, लेकिन उनका मूल कारण कुम्हार होता है, जो चाक पर एक बल लगाता है | वह बल उसकी देख रेख से आता है | भगवद-गीता में उसी विचार की व्याख्या की गयी है: सभी भौतिक क्रिया-प्रतिक्रिया के पीछे भगवान कृष्ण, जो भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व है, होते है | कृष्ण कहते है कि हर चीज उनकी उर्जा पर निर्भर करती है और फिर भी वे हर जगह नहीं है | मिटटी की उर्जा की कुछ खास परिस्थितियों में क्रिया-प्रतिक्रिया से बर्तन बनता है, लेकिन कुम्हार उस बर्तन में नहीं रहता | उसी प्रकार, भगवान द्वारा भौतिक सृष्टि बनाई गयी है, लेकिन वे इससे अलग रहते है | जैसा कि वेदों में कहा गया है, उन्होंने बस उस पर एक नज़र डाली और तुरंत ही पदार्थों में हलचल शुरू हो गयी | भगवद-गीता में यह भी कहा गया है कि भगवान भौतिक उर्जा को जीवों के हिस्से से भर देते है, और इस प्रकार तुरंत विभिन्न रूप और विभिन्न क्रियाएँ उत्पन्न होने लगती है | जीव आत्मा की अलग अलग इच्छाओं और कर्मिक क्रियाओं की वजह से अलग अलग प्रजातियों में अलग अलग प्रकार के शरीर उत्पन्न होते है | डार्विन के सिद्धांत में आत्मा के रूप में जीवित इकाई को स्वीकार नहीं किया गया है, इसलिए विकास की उनकी व्याख्या अधूरी है | तीन भौतिक प्रकृतियों की क्रिया-प्रतिक्रिया की वजह से इस ब्रह्मांड में अनेकों घटनाएँ होती है, लेकिन मूल सृजनकर्ता, या कारण, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व है, जिनका यहाँ निमित्त-मात्रम, जो कि दूरस्थ कारण है, के रूप में उल्लेख किया गया है | वे बस अपनी उर्जा से चाक को घुमाते है | मायावादी दार्शनिकों के अनुसार, सर्वोच्च ब्रह्म ने अपने आप को कई रूपों में रूपांतरित कर लिया है, लेकिन यह एक तथ्य नहीं है | भले ही वे सभी कारणों के कारण है, फिर भी वे भौतिक गुणों की क्रिया-प्रतिक्रिया से हमेशा परे है | इसलिए भगवान ब्रह्मा ब्रह्म-संहिता (5.1) में कहते है:

ईश्वरः परमः कृष्णः

सच्चिदानंद-विग्रहः

अनादि आदि गोविन्दः

सर्व-कारण-कारणम्

कई कारण और प्रभाव है, लेकिन मूल कारण श्री कृष्ण है |

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)