श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 11: युद्ध बन्द करने के लिए  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.11.17 
निमित्तमात्रं तत्रासीन्निर्गुण: पुरुषर्षभ: ।
व्यक्ताव्यक्तमिदं विश्वं यत्र भ्रमति लोहवत् ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
मेरे प्रिय ध्रुव, भगवान् प्रकृति के गुणों से कलुषित नहीं होते हैं। वो इस भौतिक जगत की उत्पत्ति के मूल कारण हैं। जब वो प्रेरणा देते हैं, तब कई अन्य कारण और परिणाम उत्पन्न होते हैं और तब सारा ब्रह्मांड उसी तरह घूमता है जैसे कि लोहा एक चुंबक की सम्मिलित शक्ति से घूमता है।
 
मेरे प्रिय ध्रुव, भगवान् प्रकृति के गुणों से कलुषित नहीं होते हैं। वो इस भौतिक जगत की उत्पत्ति के मूल कारण हैं। जब वो प्रेरणा देते हैं, तब कई अन्य कारण और परिणाम उत्पन्न होते हैं और तब सारा ब्रह्मांड उसी तरह घूमता है जैसे कि लोहा एक चुंबक की सम्मिलित शक्ति से घूमता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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