जो व्यक्ति अपने जीवनकाल में भगवान को वास्तव में संतुष्ट कर लेता है, वह स्थूल और सूक्ष्म भौतिक परिस्थितियों से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार भौतिक प्रकृति के सभी गुणों से मुक्त होकर वह असीम आध्यात्मिक आनंद प्राप्त करता है।
A person who truly pleases the Supreme Lord during his lifetime becomes free from gross and subtle material conditions. Thus, freed from all material qualities, he attains eternal soul-bliss.
तात्पर्य
पिछले श्लोक में यह समझाया गया है कि सभी जीवधारियों को सहनशीलता, दया , दोस्ती और समानता के साथ व्यवहार करना चाहिए। ऐसे व्यवहार से व्यक्ति भगवन के परम व्यक्तित्व को संतुष्ट करता है, और उनके संतुष्ट होने पर भक्त तुरंत तमाम भौतिक परिस्थितियों से मुक्त हो जाता है। भगवद गीता में भी भगवान इसकी पुष्टि करते है: "जो भी निष्ठा से और गंभीरता से मेरी सेवा में समर्पित होते है, वे तुरंत उस आध्यात्मिक अवस्था में स्थित हो जाते है जहाँ वो असीमित आध्यात्मिक आनंद का अनुभव कर सकते है।" इस भौतिक जगत में हर कोई आनंदित जीवन प्राप्त करने के लिए कठिन संघर्ष कर रहा है। दुर्भाग्यवश, लोगों को नहीं पता है कि इसे कैसे हासिल किया जाए। नास्तिक भगवान में विश्वास नहीं करते हैं, और निश्चित रूप से वो उन्हें संतुष्ट नहीं करते है। यहाँ यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भगवन के परम व्यक्तित्व को संतुष्ट करने पर व्यक्ति तुरंत आध्यात्मिक धरातल पर पहुँच जाता है और असीमित आंनदमय जीवन का आनंद लेता है। भौतिक अस्तित्व से मुक्त होने का मतलब भौतिक प्रकृति के प्रभाव से मुक्त होना है। इस श्लोक में प्रयुक्त शब्द "सम्प्रसने" का अर्थ है "संतुष्ट होना"। किसी व्यक्ति को इस प्रकार कार्य करना चाहिए कि भगवान उनकी गतिविधि से संतुष्ट हों; ऐसा नहीं है कि उन्हें स्वयं संतुष्ट होना है। निश्चित रूप से, जब भगवान संतुष्ट होते है, भक्त स्वचालित रूप से संतुष्ट हो जाता है। यह भक्ति-योग की प्रक्रिया का रहस्य है। भक्ति-योग से परे, हर कोई खुद को संतुष्ट करने की कोशिश कर रहा है। कोई भी प्रभु को संतुष्ट करने की कोशिश नहीं कर रहा है। कर्म करने वाले अपनी इंद्रियों को संतुष्ट करने की कोशिश करते है, पर वे भी जो ज्ञान के धरातल पर उत्थान पा चुके है, वे भी खुद को ही संतुष्ट करने की कोशिश करते है, सूक्ष्म रूप से। कर्म करने वाले इंद्रियों के तृप्ति से खुद को संतुष्ट करने की कोशिश करते है और ज्ञानी सूक्ष्म गतिविधियों या मानसिक अटकलों और खुद को ईश्वर समझने की कोशिश करके खुद को संतुष्ट करते है। योगी भी खुद को संतुष्ट करने की कोशिश करते है, यह सोचकर की वो विभिन्न रहस्यमय सिद्धियों को प्राप्त कर सकते है। पर केवल भक्त ही भगवन के परम व्यक्तित्व को संतुष्ट करने का प्रयास करते है। भक्तों की आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया पूरी तरह से कर्म करने वालों, ज्ञानियों और योगियों की प्रक्रियाओं से अलग है। हर कोई खुद को संतुष्ट करने की कोशिश कर रहा है, जबकि भक्त केवल भगवान को ही संतुष्ट करने की कोशिश करता है। पूजा की प्रक्रिया दूसरों से बिलकुल अलग है; भगवान की प्रेममय सेवा में अपनी इंद्रियों को उलझा कर भगवान को प्रसन्न करने के कार्य से, भक्त तुरंत आध्यात्मिक स्तर पर स्थित हो जाता है, और असीमित आनंदमय जीवन का आनंद लेता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)