स त्वं हरेरनुध्यातस्तत्पुंसामपि सम्मत: ।
कथं त्ववद्यं कृतवाननुशिक्षन् सतां व्रतम् ॥ १२ ॥
अनुवाद
भगवान के सच्चे भक्त होने के नाते, भगवान हमेशा तुम्हारे बारे में सोचते रहते हैं और तुम उनके सभी खास भक्तों द्वारा भी पहचाने जाते हो। तुम्हारा जीवन आदर्श व्यवहार के लिए है। तो फिर मुझे आश्चर्य है कि तुमने ऐसा घृणित कार्य कैसे किया?
As a pure devotee of the Lord, the Lord is always thinking of you and you are also accepted by all His most faithful devotees. Your life is an example of exemplary conduct. Therefore, I am surprised as to how you committed such a reprehensible act.
तात्पर्य
ध्रुव महाराज एक वि शुद्ध भक्त थे और हमेशा भगवान के बारे में ही सोचते रहते थे। उसी तरह, प्रभु हमेशा उन शुद्ध भक्तों के बारे में सोचते रहते हैं जो पूरी तरह उनमें ही डूबे रहते हैं। जैसे एक शुद्ध भक्त के लिए प्रभु से बढ़कर कोई नहीं होता, ठीक उसी प्रकार प्रभु के लिए भी अपने शुद्ध भक्तों के अलावा कोई नहीं होता। स्वायम्भुव मनु ने ध्रुव महाराज को यह बात कह कर समझायी। ''न केवल आप एक शुद्ध भक्त है बल्कि आपको प्रभु के सभी शुद्ध भक्तों द्वारा सम्मानित किया जाता है। आपको इस प्रकार से जीवन जीना चाहिए कि दूसरों के लिए भी आप एक प्रेरणा बन सकें। आपके बारे में यह जान कर हैरानी होती है की आपने इतने निर्दोष यक्षों की हत्या कर दी है।''
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)