श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 11: युद्ध बन्द करने के लिए  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  4.11.11 
सर्वभूतात्मभावेन भूतावासं हरिं भवान् ।
आराध्याप दुराराध्यं विष्णोस्तत्परमं पदम् ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
वैकुण्ठलोक में हरि के धाम को प्राप्त करना अत्यन्त दुष्कर है, लेकिन तुम इतने भाग्यशाली हो कि सभी जीवों के परम निवास भगवान् की पूजा करके तुम्हारा उस धाम को जाना निश्चित हो चुका है।
 
वैकुण्ठलोक में हरि के धाम को प्राप्त करना अत्यन्त दुष्कर है, लेकिन तुम इतने भाग्यशाली हो कि सभी जीवों के परम निवास भगवान् की पूजा करके तुम्हारा उस धाम को जाना निश्चित हो चुका है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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