श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 10: यक्षों के साथ ध्रुव महाराज का युद्ध  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  4.10.6 
दध्मौ शङ्खं बृहद्बाहु: खं दिशश्चानुनादयन् ।
येनोद्विग्नद‍ृश: क्षत्तरुपदेव्योऽत्रसन्भृशम् ॥ ६ ॥
 
 
अनुवाद
मैत्रेय ने आगे कहा: हे विदुर, जैसे ही ध्रुव महाराज अलकापुरी पहुँचे, उन्होंने तुरन्त शंखनाद किया जिसकी ध्वनि पूरे आकाश में गूंज उठी। यक्षों की पत्नियाँ डर गयीं और उनकी आँखों से चिंता झलक रही थी।
 
मैत्रेय ने आगे कहा: हे विदुर, जैसे ही ध्रुव महाराज अलकापुरी पहुँचे, उन्होंने तुरन्त शंखनाद किया जिसकी ध्वनि पूरे आकाश में गूंज उठी। यक्षों की पत्नियाँ डर गयीं और उनकी आँखों से चिंता झलक रही थी।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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