श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 10: यक्षों के साथ ध्रुव महाराज का युद्ध  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  4.10.26 
अहयोऽशनिनि:श्वासा वमन्तोऽग्निं रुषाक्षिभि: ।
अभ्यधावन् गजा मत्ता: सिंहव्याघ्राश्च यूथश: ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
ध्रुव महाराज ने देखा कि गुस्सैल आँखों वाले कई बड़े साँप आग उगलते हुए उन्हें निगलने के लिए दौड़े आ रहे हैं। साथ ही पागल हाथियों, शेरों और बाघों के झुंड भी उनके सामने आ गए।
 
Dhruva Maharaja saw that many serpents with furious eyes were spitting fire and rushing forward to swallow him. Along with them, groups of mad elephants, lions and tigers were also coming.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)