| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति » अध्याय 10: यक्षों के साथ ध्रुव महाराज का युद्ध » श्लोक 25 |
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| | | | श्लोक 4.10.25  | तत: खेऽदृश्यत गिरिर्निपेतु: सर्वतोदिशम् ।
गदापरिघनिस्त्रिंशमुसला: साश्मवर्षिण: ॥ २५ ॥ | | | | | | अनुवाद | | फिर आकाश में एक अत्यन्त ऊँचा पर्वत दिखायी पड़ा तथा चारों दिशाओं से भालों, गदाओं, तलवारों, चक्रों एवं पत्थरों के बड़े-बड़े टुकड़ों की वर्षा होने लगी और साथ में ओले भी गिरने लगे । | | | | फिर आकाश में एक अत्यन्त ऊँचा पर्वत दिखायी पड़ा तथा चारों दिशाओं से भालों, गदाओं, तलवारों, चक्रों एवं पत्थरों के बड़े-बड़े टुकड़ों की वर्षा होने लगी और साथ में ओले भी गिरने लगे । | | ✨ ai-generated | | |
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