श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 10: यक्षों के साथ ध्रुव महाराज का युद्ध  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  4.10.21 
अपश्यमान: स तदाततायिनं
महामृधे कञ्चन मानवोत्तम: ।
पुरीं दिद‍ृक्षन्नपि नाविशद्‌द्विषां
न मायिनां वेद चिकीर्षितं जन: ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
मानवों में श्रेष्ठ ध्रुव महाराज ने देखा कि उस विशाल युद्धभूमि में एक भी सशस्त्र शत्रु सैनिक शेष नहीं रहा था। तब उनकी इच्छा अलकापुरी देखने को हुई, लेकिन उन्होंने मन ही मन सोचा, "यक्षों की मायावी योजनाओं को कोई नहीं जानता।"
 
Dhruva Maharaja, the best among humans, saw that not even a single armed enemy soldier was left on that huge battlefield. Then he desired to see Alakapuri. But he thought in his mind, “No one knows the illusory plans of the Yakshas.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)