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श्लोक 4.10.13  |
औत्तानपादि: स तदा शस्त्रवर्षेण भूरिणा ।
न एवादृश्यताच्छन्न आसारेण यथा गिरि: ॥ १३ ॥ |
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| अनुवाद |
| ध्रुव महाराज को हथियारों ने इस तरह से ढँक लिया कि वे एक पर्वत की तरह लगने लगे जैसे कोई पर्वत बारिश के पानी से ढँक गया हो। |
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| ध्रुव महाराज को हथियारों ने इस तरह से ढँक लिया कि वे एक पर्वत की तरह लगने लगे जैसे कोई पर्वत बारिश के पानी से ढँक गया हो। |
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