श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 1: मनु की पुत्रियों की वंशावली  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  4.1.31 
अथास्मदंशभूतास्ते आत्मजा लोकविश्रुता: ।
भवितारोऽङ्ग भद्रं ते विस्रप्स्यन्ति च ते यश: ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
हे मुनिवर, हमारी शक्ति के अंशस्वरूप तुम्हारे पुत्रों का जन्म होगा और चूंकि हम तुम्हारे कल्याण के इच्छुक हैं, इसलिए वे पुत्र तुम्हारी ख्याति को पूरी दुनिया में फैलाएंगे।
 
O sage, as a part of our power, you will be born with sons and we desire your welfare, hence those sons will spread your fame throughout the world.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)