श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.9.5 
ये तु त्वदीयचरणाम्बुजकोशगन्धं
जिघ्रन्ति कर्णविवरै: श्रुतिवातनीतम् ।
भक्त्या गृहीतचरण: परया च तेषां
नापैषि नाथ हृदयाम्बुरुहात्स्वपुंसाम् ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, जो लोग वैदिक ध्वनियों द्वारा ले जाई गई आपके कमल चरणों की सुगंध को अपने कानों से सूंघते हैं, वे आपकी भक्तिमय सेवा को स्वीकार करते हैं। उनके लिए आप उनके हृदय के कमल से कभी अलग नहीं होते।
 
O Lord, those who smell with their ears the fragrance of Your feet carried by the wind of Vedic sound accept Your devotional service. For them, You are never separated from the lotus of their hearts.
तात्पर्य
भगवान् के शुद्ध भक्त के लिए भगवान् के चरण-कमलों से बढ़कर कुछ भी नहीं है, और भगवान् जानते हैं कि ऐसे भक्त उससे अधिक कुछ और नहीं चाहते। 'तु' शब्द विशेष रूप से इस तथ्य को प्रतिपादित करता है। भगवान् भी उन शुद्ध भक्तों के ह्रदय-कमलों से अलग नहीं होना चाहते हैं। शुद्ध भक्तों और भगवन् व्यक्तित्व के बीच यही पारलौकिक सम्बन्ध है। चूँकि भगवान् ऐसे शुद्ध भक्तों के ह्रदय से अलग नहीं होना चाहते, यह समझा जाता है कि वे निश्चित रूप से अद्वैतवादियों से अधिक प्रिय हैं। वैदिक अधिकार के प्रामाणिक आधार पर प्रभु की भक्तिमय सेवा के कारण प्रभु के साथ शुद्ध भक्तों का रिश्ता विकसित होता है। ऐसे शुद्ध भक्त सांसारिक भावनावादी नहीं होते, बल्कि तथ्यात्मक यथार्थवादी होते हैं क्योंकि उनकी गतिविधियों को वैदिक अधिकारियों द्वारा समर्थित किया जाता है जिन्होंने वैदिक साहित्य में वर्णित तथ्यों को श्रवण ग्रहण किया है।

'पराय' शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। परा भक्ति या ईश्वर का सहज प्रेम, प्रभु के साथ एक अंतरंग सम्बन्ध का आधार है। भगवान् के साथ सम्बन्ध के इस सर्वोच्च स्तर को भगवान् के नाम, रूप, गुण आदि के बारे में प्रामाणिक स्रोतों जैसे भगवद् गीता और श्रीमद् भागवत से सुनने से ही प्राप्त किया जा सकता है, जिसे भगवान् के शुद्ध, निष्कलंक भक्तों द्वारा सुनाया जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)