श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  3.9.42 
अहमात्मात्मनां धात: प्रेष्ठ: सन् प्रेयसामपि ।
अतो मयि रतिं कुर्याद्देहादिर्यत्कृते प्रिय: ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
मैं हर जीव का परमात्मा हूँ, सर्वोच्च निर्देशक और सबसे प्रिय हूँ। लोग गलत तरीके से स्थूल और सूक्ष्म शरीरों से जुड़े रहते हैं; उन्हें केवल मुझसे जुड़ना चाहिए।
 
I am the Supreme Soul of every living entity. I am the ultimate guide and the ultimate beloved. People are falsely attached to the gross and subtle bodies; they should be attached to Me alone.
तात्पर्य
परम प्रभु, भगवान का व्यक्तित्व, सशर्त और मुक्त दोनों अवस्थाओं में सबसे प्रिय है। जब व्यक्ति को यह नहीं पता होता है कि प्रभु ही एकमात्र प्रियतम वस्तु है, तब वह जीवन की सशर्त अवस्था में होता है और जब कोई पूरी तरह से जानता है कि प्रभु ही एकमात्र प्रियतम वस्तु है, तो उसे मुक्त माना जाता है। प्रभु के साथ अपने संबंध को जानने की डिग्री इस एहसास की डिग्री पर निर्भर करती है कि परम प्रभु प्रत्येक जीवित प्राणी की सबसे प्रिय वस्तु क्यों है। इसका वास्तविक कारण भगवद-गीता (15.7) में स्पष्ट रूप से बताया गया है। मामैवांशो जीव-लोके जीव-भूतः सनातनः: जीवित संस्थाएँ सनातन रूप से परम प्रभु के अंश और पार्सल हैं। जीवित संस्था को आत्मा कहा जाता है, और प्रभु को परमात्मा कहा जाता है। जीवित संस्था को ब्रह्म कहा जाता है, और प्रभु को परब्रह्म या परमेश्वर कहा जाता है। ईश्वरः परमः कृष्णः। सशर्त आत्माएँ, जिनके पास आत्म-साक्षात्कार नहीं होता है, भौतिक शरीर को सबसे प्रिय मानती हैं। तब प्रियतम के विचार पूरे शरीर में फैल जाते हैं, जो केंद्रित और विस्तारित दोनों होते हैं। अपने स्वयं के शरीर और उसके विस्तार जैसे बच्चों और रिश्तेदारों के लिए लगाव वास्तव में जीवित संस्था के आधार पर विकसित होता है। जैसे ही वास्तविक जीवित संस्था शरीर से बाहर निकलती है, यहाँ तक कि सबसे प्रिय बेटे का शरीर भी अब आकर्षक नहीं रह जाता है। इसलिए जीवित चिंगारी, या परम का शाश्वत हिस्सा, स्नेह का वास्तविक आधार है, न कि शरीर। क्योंकि जीवित संस्थाएँ भी संपूर्ण जीवित संस्था के हिस्से हैं, इसलिए सर्वोच्च जीवित संस्था सभी के लिए स्नेह का तथ्यात्मक आधार है। जिसने हर चीज़ के लिए अपने प्यार के मूल सिद्धांत को भुला दिया है, उसके पास केवल टिमटिमाता हुआ प्यार है क्योंकि वह माया में है। माया के सिद्धांत से जितना अधिक प्रभावित होता है, उतना ही वह प्रेम के मूल सिद्धांत से अलग हो जाता है। कोई व्यक्ति वास्तव में कुछ भी प्यार नहीं कर सकता जब तक कि वह प्रभु की प्रेममयी सेवा में पूरी तरह से विकसित न हो जाए।

वर्तमान श्लोक में, प्रेम को भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व पर केंद्रित करने पर बल दिया गया है। कुरियात शब्द यहाँ महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है "किसी के पास यह होना चाहिए।" यह केवल इस बात पर जोर देने के लिए है कि हमारे पास प्रेम के सिद्धांत के प्रति अधिक से अधिक लगाव होना चाहिए। माया का प्रभाव आंशिक और आध्यात्मिक इकाई द्वारा अनुभव किया जाता है, लेकिन यह परमात्मा, परमात्मा को प्रभावित नहीं कर सकता। मायावादी दार्शनिक, जीवित संस्था पर माया के प्रभाव को स्वीकार करते हुए, परमात्मा के साथ एक बनना चाहते हैं। लेकिन क्योंकि उनके पास परमात्मा के लिए कोई वास्तविक प्रेम नहीं है, वे हमेशा माया के प्रभाव से घिरे रहते हैं और परमात्मा के आसपास जाने में असमर्थ होते हैं। यह अक्षमता परमात्मा के प्रति उनकी स्नेह की कमी के कारण है। एक अमीर कंजूस व्यक्ति नहीं जानता कि अपने धन का उपयोग कैसे किया जाए, और इसलिए, बहुत अमीर होने के बावजूद, उसका कंजूस व्यवहार उसे हमेशा एक गरीब आदमी बनाए रखता है। दूसरी ओर, जो व्यक्ति धन का उपयोग करना जानता है वह एक छोटे से क्रेडिट बैलेंस से भी जल्दी अमीर बन सकता है।

आँखें और सूर्य आपस में बड़े ही घनिष्ठ सम्बन्ध से जुड़े हैं क्योंकि सूर्य की रोशनी के बिना आँखें नज़र नहीं आती हैं। पर शरीर के अन्य भागों, जैसे गर्मता के स्त्रोत, सूर्य से अधिक लाभ प्राप्त करते हैं, इसकी तुलना में आँखें। सूर्य के लिए स्नेह के अभाव में आँखें सूर्य की किरणों को सहन नहीं कर पातीं, या दूसरे शब्दों में कहें तो, ऐसी आँखों में सूर्य की किरणों की उपयोगिता को समझने की क्षमता नहीं होती। इसी तरह ब्राह्मण के बारे में सैद्धांतिक ज्ञान के बावजूद अनुभववादी दार्शनिक परम ब्राह्मण की दया का उपयोग नहीं कर पाते हैं क्योंकि उनमें स्नेह की कमी होती है। बहुत से अवैयक्तिक दार्शनिक हमेशा माया के प्रभाव में रहते हैं क्योंकि वे ब्राह्मण के सैद्धांतिक ज्ञान में लिप्त होते रहते हैं, उनमें ब्राह्मण के प्रति स्नेह नहीं जागता और अपनी खामियों भरी विधि के चलते वे स्नेह के विकास का कोई अवसर भी नहीं देते। सूर्य के भक्त, भले ही उनकी दृष्टि न हो, वे भी सूर्य को वैसे ही देख सकते हैं जैसे वह हैं, यहाँ तक कि इस ग्रह से भी, जबकि जो सूर्य के भक्त नहीं होते हैं, वे चमकती हुई रोशनी को भी बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। इसी तरह भक्तिपूर्ण सेवा से, भले ही कोई ज्ञानी के स्तर पर न हो, वह भी अपने अंदर ही ईश्वर के व्यक्तित्व को देख सकता है क्योंकि उसमें निश्छल प्रेम विकसित होता है। सभी परिस्थितियों में ईश्वर के प्रति प्रेम को विकसित करने का प्रयास करना चाहिए, और उससे सारी विवादित समस्याओं का समाधान हो जाएगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)