वर्तमान श्लोक में, प्रेम को भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व पर केंद्रित करने पर बल दिया गया है। कुरियात शब्द यहाँ महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है "किसी के पास यह होना चाहिए।" यह केवल इस बात पर जोर देने के लिए है कि हमारे पास प्रेम के सिद्धांत के प्रति अधिक से अधिक लगाव होना चाहिए। माया का प्रभाव आंशिक और आध्यात्मिक इकाई द्वारा अनुभव किया जाता है, लेकिन यह परमात्मा, परमात्मा को प्रभावित नहीं कर सकता। मायावादी दार्शनिक, जीवित संस्था पर माया के प्रभाव को स्वीकार करते हुए, परमात्मा के साथ एक बनना चाहते हैं। लेकिन क्योंकि उनके पास परमात्मा के लिए कोई वास्तविक प्रेम नहीं है, वे हमेशा माया के प्रभाव से घिरे रहते हैं और परमात्मा के आसपास जाने में असमर्थ होते हैं। यह अक्षमता परमात्मा के प्रति उनकी स्नेह की कमी के कारण है। एक अमीर कंजूस व्यक्ति नहीं जानता कि अपने धन का उपयोग कैसे किया जाए, और इसलिए, बहुत अमीर होने के बावजूद, उसका कंजूस व्यवहार उसे हमेशा एक गरीब आदमी बनाए रखता है। दूसरी ओर, जो व्यक्ति धन का उपयोग करना जानता है वह एक छोटे से क्रेडिट बैलेंस से भी जल्दी अमीर बन सकता है।
आँखें और सूर्य आपस में बड़े ही घनिष्ठ सम्बन्ध से जुड़े हैं क्योंकि सूर्य की रोशनी के बिना आँखें नज़र नहीं आती हैं। पर शरीर के अन्य भागों, जैसे गर्मता के स्त्रोत, सूर्य से अधिक लाभ प्राप्त करते हैं, इसकी तुलना में आँखें। सूर्य के लिए स्नेह के अभाव में आँखें सूर्य की किरणों को सहन नहीं कर पातीं, या दूसरे शब्दों में कहें तो, ऐसी आँखों में सूर्य की किरणों की उपयोगिता को समझने की क्षमता नहीं होती। इसी तरह ब्राह्मण के बारे में सैद्धांतिक ज्ञान के बावजूद अनुभववादी दार्शनिक परम ब्राह्मण की दया का उपयोग नहीं कर पाते हैं क्योंकि उनमें स्नेह की कमी होती है। बहुत से अवैयक्तिक दार्शनिक हमेशा माया के प्रभाव में रहते हैं क्योंकि वे ब्राह्मण के सैद्धांतिक ज्ञान में लिप्त होते रहते हैं, उनमें ब्राह्मण के प्रति स्नेह नहीं जागता और अपनी खामियों भरी विधि के चलते वे स्नेह के विकास का कोई अवसर भी नहीं देते। सूर्य के भक्त, भले ही उनकी दृष्टि न हो, वे भी सूर्य को वैसे ही देख सकते हैं जैसे वह हैं, यहाँ तक कि इस ग्रह से भी, जबकि जो सूर्य के भक्त नहीं होते हैं, वे चमकती हुई रोशनी को भी बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। इसी तरह भक्तिपूर्ण सेवा से, भले ही कोई ज्ञानी के स्तर पर न हो, वह भी अपने अंदर ही ईश्वर के व्यक्तित्व को देख सकता है क्योंकि उसमें निश्छल प्रेम विकसित होता है। सभी परिस्थितियों में ईश्वर के प्रति प्रेम को विकसित करने का प्रयास करना चाहिए, और उससे सारी विवादित समस्याओं का समाधान हो जाएगा।
