भगवद् व्यक्तित्व के सभी पूर्ण विस्तार समान रूप से शक्तिशाली हैं, जैसा कि ब्रह्म-संहिता (5.46) में पुष्टि की गई है:
दीपार्चिर एव हि दशांतरामभ्युपेत्य
दीपायते विवृता-हेतु-समान-धर्मा
यस्तार्दृग एव हि च विष्णुतया विभाति
गोविंदम आदि-पुरुषं तम अहम भजामि
भगवान स्वयं का विस्तार उसी प्रकार करते हैं जैसे आग की लपटें एक के बाद एक फैलती हैं। यद्यपि मूल लौ, या श्री कृष्ण, को गोविंद, सर्वोच्च व्यक्ति के रूप में स्वीकार किया जाता है, अन्य सभी विस्तार, जैसे राम, नृसिंह और वराह, मूल भगवान जितने ही शक्तिशाली हैं। इस तरह के सभी विस्तारित रूप पारलौकिक हैं। श्रीमद्-भागवतम् के आरंभ में यह स्पष्ट किया गया है कि परम सत्य सदैव भौतिक स्पर्श से अलिप्त रहता है। भगवान के पारलौकिक राज्य में शब्दों और गतिविधियों की कोई बाजीगरी नहीं है। प्रभु के सभी रूप पारलौकिक हैं, और ऐसी अभिव्यक्तियाँ सदैव एक समान हैं। प्रभु का एक विशेष रूप जो एक भक्त को प्रदर्शित किया जाता है, सांसारिक नहीं है, भले ही भक्त भौतिक इच्छा को बनाए रख सकता है, और न ही यह भौतिक ऊर्जा के प्रभाव में प्रकट होता है, जैसा कि अवैयक्तिकवादियों द्वारा मूर्खतापूर्वक माना जाता है। वे अवैयक्तिकवादी जो भगवान के पारलौकिक रूपों को भौतिक जगत का उत्पाद मानते हैं, निश्चित रूप से नरक के लिए नियत हैं।
