श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.9.4 
तद्वा इदं भुवनमङ्गल मङ्गलाय
ध्याने स्म नो दर्शितं त उपासकानाम् ।
तस्मै नमो भगवतेऽनुविधेम तुभ्यं
योऽनाद‍ृतो नरकभाग्भिरसत्प्रसङ्गै: ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
यह वर्तमान स्वरूप या भगवान श्री कृष्ण द्वारा विस्तारित कोई भी दिव्य स्वरूप सभी ब्रह्मांडों के लिए समान रूप से मंगलमय है। चूँकि आपने यह अनादि साकार रूप प्रकट किया है जिसका ध्यान आपके भक्त करते हैं, इसलिए मैं आपको आदरपूर्वक नमन करता हूँ। जिनका नरक जाना तय है, वे आपके साकार रूप की उपेक्षा कर देते हैं क्योंकि वे लोग भौतिक विषयों की कल्पना ही करते रहते हैं।
 
This present form of the Supreme Personality of Godhead Krishna or any other transcendental form expanded by Him is equally auspicious for all the universes. Since You have manifested this eternally corporeal form, which is meditated upon by Your devotees, I offer My respectful obeisances unto You. Those who are destined to go to hell ignore Your corporeal form because they keep imagining only material objects.
तात्पर्य
परम पूर्ण सत्य की वैयक्तिक और अवैयक्तिक विशेषताओं के संबंध में, भगवान द्वारा अपने विभिन्न पूर्ण विस्तार में प्रदर्शित वैयक्तिक रूप सभी ब्रह्मांडों के कल्याण के लिए हैं। भगवान के वैयक्तिक रूप की ध्यान में परमात्मा, परमात्मा के रूप में भी पूजा की जाती है, लेकिन अवैयक्तिक ब्रह्मज्योति की पूजा नहीं की जाती है। जो व्यक्ति भगवान की अवैयक्तिक विशेषता के आदी हैं, चाहे ध्यान में हों या अन्यथा, सभी नरक के तीर्थयात्री हैं क्योंकि, जैसा कि भगवद-गीता (12.5) में कहा गया है, अवैयक्तिकवादी केवल सांसारिक मानसिक अटकलों में अपना समय बर्बाद करते हैं क्योंकि वे झूठे तर्कों के प्रति वास्तविकता से अधिक आसक्त हैं। इसलिए, अवैयक्तिकवादियों के संगठन की निंदा ब्रह्मा ने की है।

भगवद् व्यक्तित्व के सभी पूर्ण विस्तार समान रूप से शक्तिशाली हैं, जैसा कि ब्रह्म-संहिता (5.46) में पुष्टि की गई है:

दीपार्चिर एव हि दशांतरामभ्युपेत्य

दीपायते विवृता-हेतु-समान-धर्मा

यस्तार्दृग एव हि च विष्णुतया विभाति

गोविंदम आदि-पुरुषं तम अहम भजामि

भगवान स्वयं का विस्तार उसी प्रकार करते हैं जैसे आग की लपटें एक के बाद एक फैलती हैं। यद्यपि मूल लौ, या श्री कृष्ण, को गोविंद, सर्वोच्च व्यक्ति के रूप में स्वीकार किया जाता है, अन्य सभी विस्तार, जैसे राम, नृसिंह और वराह, मूल भगवान जितने ही शक्तिशाली हैं। इस तरह के सभी विस्तारित रूप पारलौकिक हैं। श्रीमद्-भागवतम् के आरंभ में यह स्पष्ट किया गया है कि परम सत्य सदैव भौतिक स्पर्श से अलिप्त रहता है। भगवान के पारलौकिक राज्य में शब्दों और गतिविधियों की कोई बाजीगरी नहीं है। प्रभु के सभी रूप पारलौकिक हैं, और ऐसी अभिव्यक्तियाँ सदैव एक समान हैं। प्रभु का एक विशेष रूप जो एक भक्त को प्रदर्शित किया जाता है, सांसारिक नहीं है, भले ही भक्त भौतिक इच्छा को बनाए रख सकता है, और न ही यह भौतिक ऊर्जा के प्रभाव में प्रकट होता है, जैसा कि अवैयक्तिकवादियों द्वारा मूर्खतापूर्वक माना जाता है। वे अवैयक्तिकवादी जो भगवान के पारलौकिक रूपों को भौतिक जगत का उत्पाद मानते हैं, निश्चित रूप से नरक के लिए नियत हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)