श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  3.9.38 
यच्चकर्थाङ्ग मतस्तोत्रं मत्कथाभ्युदयाङ्कितम् ।
यद्वा तपसि ते निष्ठा स एष मदनुग्रह: ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मा, मेरे अद्भुत कार्यों की प्रशंसा में पढ़ी गई तुम्हारी प्रार्थनाएँ, मुझे समझने के लिए किया गया तुम्हारा तप और मुझमें तुम्हारा अटूट विश्वास—ये सब मेरी अपार कृपा का फल हैं।
 
O Brahma, the praises you have sung praising the glories of My divine activities, the austerities you have performed to understand Me, and your firm faith in Me - consider all these as My causeless mercy.
तात्पर्य
जब कोई जीव भगवान की भक्ति में सेवा करने का इच्छुक होता है तो भगवान, भक्त की चेत्य-गुरु के माध्यम से अर्थात भीतर के आध्यात्मिक गुरु के माध्यम से कई तरीकों से मदद करते हैं। इस प्रकार भक्त कई अद्भुत क्रियाकलाप कर सकता है जिनकी ज़्यादा भौतिक आंकलन नहीं किया जा सकता है। प्रभु की दया से एक आम व्यक्ति भी सर्वोच्च आध्यात्मिक पूर्णता की प्रार्थना कर सकता है। ऐसी आध्यात्मिक पूर्णता भौतिक योग्यताओं से सीमित नहीं है बल्कि पारलौकिक सेवा की एक ईमानदार कोशिश से विकसित होती है। स्वैच्छिक प्रयास आध्यात्मिक पूर्णता की एकमात्र योग्यता है। धन या शिक्षा के भौतिक अधिग्रहण पर विचार नहीं किया जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)