श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  3.9.35 
ऋषिमाद्यं न बध्नाति पापीयांस्त्वां रजोगुण: ।
यन्मनो मयि निर्बद्धं प्रजा: संसृजतोऽपि ते ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
तुम आदि ऋषि हो और तुम्हारा मन सदैव मुझमें लगा रहता है, इसी कारण विभिन्न संतानों को जन्म देने के कार्य में संलग्न रहने पर भी तुम्हारे पास पापमय रजोगुण फटक भी नहीं सकेगा।
 
तुम आदि ऋषि हो और तुम्हारा मन सदैव मुझमें लगा रहता है, इसी कारण विभिन्न संतानों को जन्म देने के कार्य में संलग्न रहने पर भी तुम्हारे पास पापमय रजोगुण फटक भी नहीं सकेगा।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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