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श्लोक 3.9.34  |
नानाकर्मवितानेन प्रजा बह्वी: सिसृक्षत: ।
नात्मावसीदत्यस्मिंस्ते वर्षीयान्मदनुग्रह: ॥ ३४ ॥ |
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| अनुवाद |
| जब से तुमने जनसंख्या को असंख्य रूपों में बढ़ाने तथा अपनी सेवा के प्रकारों को विस्तार देने की इच्छा जताई है, इस विषय से तुम कभी वंचित नहीं रहोगे क्योंकि मेरी निस्वार्थ कृपा हमेशा तुम्हारे लिये बढ़ती ही रहेगी। |
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| जब से तुमने जनसंख्या को असंख्य रूपों में बढ़ाने तथा अपनी सेवा के प्रकारों को विस्तार देने की इच्छा जताई है, इस विषय से तुम कभी वंचित नहीं रहोगे क्योंकि मेरी निस्वार्थ कृपा हमेशा तुम्हारे लिये बढ़ती ही रहेगी। |
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