जब तुम स्थूल और सूक्ष्म शरीर की अवधारणा से मुक्त हो जाते हो और तुम्हारी इंद्रियाँ भौतिक प्रकृति के गुणों के सभी प्रभावों से मुक्त हो जाती हैं, तब तुम मेरी संगति में अपने शुद्ध रूप का एहसास कर पाओगे। उस समय तुम शुद्ध चेतना में स्थित होगे।
When you are free from the idea of gross and subtle bodies and your senses are free from all the influences of nature, then you will be able to realize your pure form in association with Me. Then you will be situated in pure consciousness.
तात्पर्य
भक्ति-रसामृत-सिंधु में कहा गया है कि जिस व्यक्ति की केवल यही इच्छा होती है कि वह भगवान की उदात्त प्रेममयी सेवा करें, तो वह भौतिक अस्तित्व के किसी भी हाल में एक स्वतंत्र व्यक्ति होता है। वह सेवा करने वाला भाव, जीव की स्वरूप या वास्तविक स्वरूप है। भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने भी चैतन्य चरितामृत में इस कथन की पुष्टि की है कि जीव का वास्तविक, आध्यात्मिक स्वरूप सर्वोच्च भगवान की शाश्वत सेवा है। मायावादी संप्रदाय जीव के सेवा भाव से ही कांप उठते हैं, यह जाने बिना कि पारलौकिक दुनिया में भगवान की सेवा पारलौकिक प्रेम पर आधारित होती है। पारलौकिक प्रेमपूर्ण सेवा की तुलना भौतिक दुनिया की जबरन की गई सेवा से कभी नहीं की जानी चाहिए। भौतिक दुनिया में, भले ही यदि किसी को यह धारणा होती हो कि वह किसी का सेवक नहीं है, फिर भी वह भौतिक प्रवृत्तियों के निर्देशन में अपने इंद्रियों का सेवक बना रहता है। वास्तव में भौतिक दुनिया में कोई भी स्वामी नहीं होता है और इसीलिए इंद्रियों के सेवकों को सेवा का एक बहुत बुरा अनुभव होता है। वे सेवा के विचार से कांप उठते हैं क्योंकि उन्हें पारलौकिक स्थिति का कोई ज्ञान नहीं होता है। पारलौकिक प्रेमपूर्ण सेवा में, सेवक भगवान की तरह ही स्वतंत्र होता है। भगवान स्वराट, या पूर्णतय स्वतंत्र हैं और सेवक भी आध्यात्मिक वातावरण में पूरी तरह से स्वतंत्र, या स्वराट है क्योंकि वहां कोई जबरन सेवा नहीं होती है। वहां पारलौकिक प्रेमपूर्ण सेवा स्वतःस्फूर्त प्रेम के कारण होती है। इस तरह की सेवा की एक प्रतिबिंबित झलक मां की बेटे की सेवा में, दोस्त की दोस्त की सेवा में, या पत्नी की पति की सेवा में अनुभव की जाती है। दोस्तों, माता-पिता या पत्नियों द्वारा की जाने वाली सेवा का यह प्रतिबिंब जबरन नहीं होता है, बल्कि यह केवल प्रेम के कारण होता है। यहां भौतिक दुनिया में, हालांकि, प्रेमपूर्ण सेवा केवल एक प्रतिबिंब है। वास्तविक सेवा, या स्वरूप में सेवा, पारलौकिक दुनिया में भगवान के साथ संगति में मौजूद होती है। पारलौकिक प्रेम में वही सेवा यहां भक्ति में अभ्यास की जा सकती है। यह श्लोक ज्ञानी संप्रदाय पर भी लागू होता है। प्रबुद्ध ज्ञानी, जब सभी भौतिक दोषों, अर्थात् स्थूल और सूक्ष्म शरीरों के साथ-साथ प्रकृति के भौतिक तरीकों की इंद्रियों से मुक्त हो जाते हैं, तो वह सर्वोच्च में स्थापित हो जाते हैं और इस प्रकार भौतिक बंधन से मुक्त हो जाते हैं। ज्ञानी और भक्त वास्तव में भौतिक दोषों से मुक्ति के बिंदु तक समझौते में हैं। लेकिन जहां ज्ञानी समझ की सरल पटरी पर संतुष्ट रहते हैं, वहीं भक्त प्रेमपूर्ण सेवा में और अधिक आध्यात्मिक उन्नति करते हैं। भक्त अपने स्वतःस्फूर्त सेवा भाव में एक आध्यात्मिक व्यक्तित्व विकसित करते हैं, जो माधुर्य-रस, या प्रेमी और प्रिय के बीच पारस्परिक पारलौकिक प्रेमपूर्ण सेवा की स्थिति तक और आगे बढ़ता रहता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥