श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.9.30 
भूयस्त्वं तप आतिष्ठ विद्यां चैव मदाश्रयाम् ।
ताभ्यामन्तर्हृदि ब्रह्मन् लोकान्द्रक्ष्यस्यपावृतान् ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मा, तपस्या और ध्यान में रमकर ज्ञान के सिद्धांतों का पालन करो। इससे तुम अपने अंतर में सब कुछ समझ सकोगे और मेरी कृपा प्राप्त कर सकोगे।
 
O Brahma, you must engage yourself in penance and meditation and follow the principles of knowledge to obtain my grace. By these actions you will be able to understand everything from within your heart.
तात्पर्य
परमेश्‍वर उस खास व्यक्ति पर दया करते हैं जो उसे सौंपे गए जिम्मेदार काम को निष्‍पादित करने में लगा है। पर उनकी दया तपश्‍चर्य और भक्ति सेवा के निष्पादन में दृढ़ता के कारण प्राप्‍त होती है। ब्रह्मा को ग्रह प्रणालियों के सृजन का काम सौंपा गया था। परमेश्‍वर ने उन्‍हें निर्देश दिया कि जब वे ध्यान करेंगे तो आसानी से जान पाएंगे कि ग्रह प्रणालियां कहां और कैसे लगाई जानी हैं। निर्देश भीतर से ही आने थे और उस काम में चिंता की कोई आवश्‍यकता नहीं थी। बुद्धि-योग के ऐसे निर्देश सीधे भीतर से परमेश्‍वर द्वारा दिए जाते हैं, जैसा कि भगवद-गीता (10.10) में पुष्टि की गई है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)