मतिर ना कृष्णे परतः स्वतो वा
मिथो'भिपद्येता गृह-व्रतानाम्
अदांता-गोभिः विषतं तमिस्रं
पुनः पुनः चर्वित-चर्वणानाम्
ना ते विदुः स्वार्थ-गतिं हि विष्णुं
दुराशया ये बहिर-अर्थ-मानिनः
अंधा यथांधैर उपनीयमानास
ते'पीश-तंत्र्याम् उरु-दामनि बद्धाः
नैषां मतिस तावद उरुक्रमांघ्रिम्
स्पृशत्य अनर्थआपगमो यद-अर्थः
महीयसाम् पद-रजो-'भिषेकं
निष्किंचनानां ना वृणिता यावत
"वे व्यक्ति जो पूर्ण रूप से झूठे, भौतिक सुख में सड़ने के लिए दृढ़ हैं, वे शिक्षकों के निर्देशों, आत्म-साक्षात्कार या संसदीय चर्चाओं द्वारा कृष्ण-दिमाग नहीं बन सकते। उन्हें अनर्गल इंद्रियों द्वारा अज्ञान के सबसे काले क्षेत्र में खींचा जाता है, और इस प्रकार वे पागलपन की हद तक उसमें संलग्न रहते हैं जिसे 'चबाना' कहा जाता है।
"अपनी मूर्खतापूर्ण गतिविधियों के कारण, वे इस बात से अनजान रहते हैं कि मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य ब्रह्मांडीय प्रकटीकरण के भगवान, विष्णु को प्राप्त करना है, और इसलिए भौतिक सभ्यता की गलत दिशा में उनका अस्तित्व के लिए संघर्ष है, जो बाहरी ऊर्जा के अधीन है। उनका नेतृत्व समान मूर्ख व्यक्ति करते हैं, जैसे कि एक अंधे व्यक्ति का नेतृत्व दूसरे अंधे आदमी द्वारा किया जाता है और दोनों खाई में गिर जाते हैं।
"इस तरह के मूर्ख व्यक्ति सर्वोच्च शक्तिशाली की गतिविधियों की ओर आकर्षित नहीं हो सकते, जो वास्तव में उनकी मूर्खतापूर्ण गतिविधियों के लिए निष्प्रभावी उपाय है, जब तक और जब तक कि उनके पास महान आत्माओं द्वारा निर्देशित होने का अच्छा अर्थ नहीं होता जो भौतिक आसक्ति से पूरी तरह मुक्त हैं।"
भगवद-गीता में भगवान सभी से अपने अन्य व्यावसायिक कर्तव्यों को छोड़ने और पूरी तरह से अर्चना गतिविधियों में, या प्रभु को प्रसन्न करने में संलग्न होने के लिए कहते हैं। लेकिन लगभग कोई भी इस तरह की अर्चना गतिविधि की ओर आकर्षित नहीं होता है। हर कोई कमोबेश उन गतिविधियों से आकर्षित होता है जो सर्वोच्च भगवान के विद्रोह की स्थिति हैं। ज्ञान और योग की प्रणालियां भी अप्रत्यक्ष रूप से भगवान के खिलाफ विद्रोही कृत्य हैं। प्रभु की अर्चना को छोड़कर कोई शुभ कार्य नहीं है। ज्ञान और योग को कभी-कभी अर्चना के दायरे में स्वीकार किया जाता है, जब अंतिम लक्ष्य विष्णु होता है, और अन्यथा नहीं। निष्कर्ष यह है कि केवल भगवान के भक्त ही मोक्ष के पात्र प्रामाणिक मनुष्य हैं। अन्य लोग बिना किसी वास्तविक लाभ के अस्तित्व के लिए व्यर्थ संघर्ष कर रहे हैं।
