श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.9.17 
लोको विकर्मनिरत: कुशले प्रमत्त:
कर्मण्ययं त्वदुदिते भवदर्चने स्वे ।
यस्तावदस्य बलवानिह जीविताशां
सद्यश्छिनत्त्यनिमिषाय नमोऽस्तु तस्मै ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
सामान्य लोग मूर्खतापूर्ण कामों में लिप्त रहते हैं, उन लाभप्रद कामों में नहीं जिन्हें आपने सीधे उनके मार्गदर्शन के लिए घोषित किया है। जब तक मूर्खतापूर्ण काम करने की उनकी प्रवृत्ति शक्तिशाली बनी रहती है, तब तक अस्तित्व के संघर्ष में उनकी सभी योजनाएँ ध्वस्त हो जाती हैं। इसलिए मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ जो शाश्वत समय के रूप हैं।
 
Ordinary people engage in foolish activities. They do not engage themselves in the beneficial activities directly declared by You for their guidance. As long as their tendency to foolish activities remains strong, all their plans will be shattered in the struggle of life. Therefore, I bow to Him who is the embodiment of eternal time.
तात्पर्य
लोग सामान्य रूप से व्यर्थ के कामों में लगे रहते हैं। वे व्यवस्थित रूप से वास्तविक लाभकारी काम से बेखबर रहते हैं, जो कि उस प्रभु की भक्ति सेवा है, जिसे तकनीकी रूप से अर्चना विनियम कहा जाता है। अर्चना विनियम सीधे भगवान द्वारा नारद-पंचरात्र में बताए गए हैं और बुद्धिमान पुरुषों द्वारा सख्ती से पालन किया जाता है, जो अच्छी तरह से जानते हैं कि जीवन का सर्वोच्च पूर्णता लक्ष्य भगवान विष्णु तक पहुंचना है, जो ब्रह्मांडीय प्रकटता नामक वृक्ष की जड़ है। इसके अलावा, भागवत में और भगवद-गीता में इस तरह की नियामक गतिविधियों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। मूर्ख लोग नहीं जानते कि उनकी स्वार्थी रुचि विष्णु के अहसास में है। भागवत (7.5.30-32) कहता है:

मतिर ना कृष्णे परतः स्वतो वा

मिथो'भिपद्येता गृह-व्रतानाम्

अदांता-गोभिः विषतं तमिस्रं

पुनः पुनः चर्वित-चर्वणानाम्

ना ते विदुः स्वार्थ-गतिं हि विष्णुं

दुराशया ये बहिर-अर्थ-मानिनः

अंधा यथांधैर उपनीयमानास

ते'पीश-तंत्र्याम् उरु-दामनि बद्धाः

नैषां मतिस तावद उरुक्रमांघ्रिम्

स्पृशत्य अनर्थआपगमो यद-अर्थः

महीयसाम् पद-रजो-'भिषेकं

निष्किंचनानां ना वृणिता यावत

"वे व्यक्ति जो पूर्ण रूप से झूठे, भौतिक सुख में सड़ने के लिए दृढ़ हैं, वे शिक्षकों के निर्देशों, आत्म-साक्षात्कार या संसदीय चर्चाओं द्वारा कृष्ण-दिमाग नहीं बन सकते। उन्हें अनर्गल इंद्रियों द्वारा अज्ञान के सबसे काले क्षेत्र में खींचा जाता है, और इस प्रकार वे पागलपन की हद तक उसमें संलग्न रहते हैं जिसे 'चबाना' कहा जाता है।

"अपनी मूर्खतापूर्ण गतिविधियों के कारण, वे इस बात से अनजान रहते हैं कि मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य ब्रह्मांडीय प्रकटीकरण के भगवान, विष्णु को प्राप्त करना है, और इसलिए भौतिक सभ्यता की गलत दिशा में उनका अस्तित्व के लिए संघर्ष है, जो बाहरी ऊर्जा के अधीन है। उनका नेतृत्व समान मूर्ख व्यक्ति करते हैं, जैसे कि एक अंधे व्यक्ति का नेतृत्व दूसरे अंधे आदमी द्वारा किया जाता है और दोनों खाई में गिर जाते हैं।

"इस तरह के मूर्ख व्यक्ति सर्वोच्च शक्तिशाली की गतिविधियों की ओर आकर्षित नहीं हो सकते, जो वास्तव में उनकी मूर्खतापूर्ण गतिविधियों के लिए निष्प्रभावी उपाय है, जब तक और जब तक कि उनके पास महान आत्माओं द्वारा निर्देशित होने का अच्छा अर्थ नहीं होता जो भौतिक आसक्ति से पूरी तरह मुक्त हैं।"

भगवद-गीता में भगवान सभी से अपने अन्य व्यावसायिक कर्तव्यों को छोड़ने और पूरी तरह से अर्चना गतिविधियों में, या प्रभु को प्रसन्न करने में संलग्न होने के लिए कहते हैं। लेकिन लगभग कोई भी इस तरह की अर्चना गतिविधि की ओर आकर्षित नहीं होता है। हर कोई कमोबेश उन गतिविधियों से आकर्षित होता है जो सर्वोच्च भगवान के विद्रोह की स्थिति हैं। ज्ञान और योग की प्रणालियां भी अप्रत्यक्ष रूप से भगवान के खिलाफ विद्रोही कृत्य हैं। प्रभु की अर्चना को छोड़कर कोई शुभ कार्य नहीं है। ज्ञान और योग को कभी-कभी अर्चना के दायरे में स्वीकार किया जाता है, जब अंतिम लक्ष्य विष्णु होता है, और अन्यथा नहीं। निष्कर्ष यह है कि केवल भगवान के भक्त ही मोक्ष के पात्र प्रामाणिक मनुष्य हैं। अन्य लोग बिना किसी वास्तविक लाभ के अस्तित्व के लिए व्यर्थ संघर्ष कर रहे हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)