श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.9.16 
यो वा अहं च गिरिशश्च विभु: स्वयं च
स्थित्युद्भवप्रलयहेतव आत्ममूलम् ।
भित्त्वा त्रिपाद्ववृध एक उरुप्ररोह-
स्तस्मै नमो भगवते भुवनद्रुमाय ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
आप लोक रूपी वृक्ष की आदि जड़ हैं। यह वृक्ष सर्वप्रथम भौतिक प्रकृति को तीन तनों के रूप में—मेरे रूप में, शिव के रूप में और आप सर्वशक्तिमान के रूप में—सृजन, पालन और विनाश के लिए भेदकर निकला है और हम तीनों से कई शाखाएँ निकल आई हैं। इसीलिए हे विराट जगत रूपी वृक्ष, मैं आपको प्रणाम करता हूँ।
 
You are the root of the tree of the universe. This tree first broke through the material nature in the form of three trunks—me, Shiva and you, the Almighty—for creation, sustenance and destruction, and many branches have emerged from the three of us. Therefore, O tree of the vast universe, I salute you.
तात्पर्य
ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति मोटे तौर पर तीन लोकों में विभाजित है: उच्च, निम्न और मध्य ग्रहीय प्रणालियाँ और फिर यह सर्वोच्च मूल के रूप में भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति के साथ, चौदह ग्रहीय प्रणालियों के ब्रह्मांड में विस्तृत होती है। भौतिक प्रकृति, जो ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति का कारण प्रतीत होती है, केवल भगवान की एजेंसी या ऊर्जा है। यह भगवद-गीता (9.10) में पुष्टि की गई है: मायाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सा-चराचरम। "केवल सर्वोच्च भगवान की देखरेख में भौतिक प्रकृति ही सभी सृजन, रखरखाव और विघटन का कारण प्रतीत होती है।" भगवान क्रमशः रखरखाव, सृजन और विनाश के लिए तीनों - विष्णु, ब्रह्मा और शिव में स्वयं का विस्तार करते हैं। भौतिक प्रकृति के तीन प्रकारों को नियंत्रित करने वाले तीन प्रमुख एजेंटों में से, विष्णु सर्वशक्तिमान हैं; भले ही वह रखरखाव के उद्देश्य से भौतिक प्रकृति में हैं, लेकिन वह भौतिक प्रकृति के नियमों द्वारा नियंत्रित नहीं हैं। ब्रह्मा और शिव अन्य दो, हालांकि लगभग विष्णु जितने ही शक्तिशाली हैं, सर्वोच्च भगवान की भौतिक ऊर्जा के नियंत्रण में हैं। भौतिक प्रकृति के कई विभागों को नियंत्रित करने वाले कई देवताओं की अवधारणा मूर्ख पैंथिस्ट द्वारा गलत तरीके से कल्पित है। ईश्वर एक है बिना किसी दूसरे के, और वह सभी कारणों का मूल कारण है। जैसे सरकारी मामलों के कई विभागीय प्रमुख होते हैं, वैसे ही सार्वभौमिक मामलों के प्रबंधन के भी कई प्रमुख होते हैं।

ज्ञान की कमी के कारण, अवैयक्तिक व्यक्तिगत प्रबंधन में विश्वास नहीं करता है क्योंकि चीजें वैसी ही हैं। लेकिन इस श्लोक में यह स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि सब कुछ व्यक्तिगत है और कुछ भी अवैयक्तिक नहीं है। हम इस बिंदु पर पहले ही प्रस्तावना में चर्चा कर चुके हैं, और इसकी पुष्टि यहाँ इस श्लोक में की गई है. भौतिक अभिव्यक्ति के पेड़ का वर्णन भगवद-गीता के पंद्रहवें अध्याय में एक अश्वत्थ पेड़ के रूप में किया गया है जिसकी जड़ ऊपर की ओर है। जब हम पानी के जलाशय के किनारे किसी पेड़ की परछाई देखते हैं तो हमें ऐसे पेड़ का वास्तविक अनुभव होता है। पानी पर पेड़ का प्रतिबिंब उसकी ऊपर की ओर जड़ों से लटका हुआ प्रतीत होता है। यहाँ वर्णित सृष्टि का वृक्ष वास्तविकता की केवल एक छाया है जो परब्रह्म, विष्णु है। वैकुंठालोक में प्रकट आंतरिक शक्ति में, वास्तविक पेड़ मौजूद है, और भौतिक प्रकृति में प्रतिबिंबित पेड़ केवल इस वास्तविक पेड़ की छाया है। अवैयक्तिक सिद्धांत कि ब्राह्मण सभी विविधताओं से रहित है, असत्य है क्योंकि भगवद-गीता में वर्णित छाया-वृक्ष एक वास्तविक पेड़ का प्रतिबिंब होने के बिना मौजूद नहीं हो सकता है। वास्तविक वृक्ष आध्यात्मिक प्रकृति के शाश्वत अस्तित्व में स्थित है, जो दिव्य किस्मों से भरा हुआ है, और भगवान विष्णु उस वृक्ष की जड़ भी हैं। जड़ एक ही है - भगवान - वास्तविक पेड़ और झूठ दोनों के लिए, लेकिन झूठा पेड़ केवल वास्तविक पेड़ का विकृत प्रतिबिंब है। प्रभु, सच्चे वृक्ष होने के कारण, यहाँ ब्रह्मा द्वारा स्वयं की ओर से और भगवान शिव की ओर से भी प्रणाम किए जाते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)