ज्ञान की कमी के कारण, अवैयक्तिक व्यक्तिगत प्रबंधन में विश्वास नहीं करता है क्योंकि चीजें वैसी ही हैं। लेकिन इस श्लोक में यह स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि सब कुछ व्यक्तिगत है और कुछ भी अवैयक्तिक नहीं है। हम इस बिंदु पर पहले ही प्रस्तावना में चर्चा कर चुके हैं, और इसकी पुष्टि यहाँ इस श्लोक में की गई है. भौतिक अभिव्यक्ति के पेड़ का वर्णन भगवद-गीता के पंद्रहवें अध्याय में एक अश्वत्थ पेड़ के रूप में किया गया है जिसकी जड़ ऊपर की ओर है। जब हम पानी के जलाशय के किनारे किसी पेड़ की परछाई देखते हैं तो हमें ऐसे पेड़ का वास्तविक अनुभव होता है। पानी पर पेड़ का प्रतिबिंब उसकी ऊपर की ओर जड़ों से लटका हुआ प्रतीत होता है। यहाँ वर्णित सृष्टि का वृक्ष वास्तविकता की केवल एक छाया है जो परब्रह्म, विष्णु है। वैकुंठालोक में प्रकट आंतरिक शक्ति में, वास्तविक पेड़ मौजूद है, और भौतिक प्रकृति में प्रतिबिंबित पेड़ केवल इस वास्तविक पेड़ की छाया है। अवैयक्तिक सिद्धांत कि ब्राह्मण सभी विविधताओं से रहित है, असत्य है क्योंकि भगवद-गीता में वर्णित छाया-वृक्ष एक वास्तविक पेड़ का प्रतिबिंब होने के बिना मौजूद नहीं हो सकता है। वास्तविक वृक्ष आध्यात्मिक प्रकृति के शाश्वत अस्तित्व में स्थित है, जो दिव्य किस्मों से भरा हुआ है, और भगवान विष्णु उस वृक्ष की जड़ भी हैं। जड़ एक ही है - भगवान - वास्तविक पेड़ और झूठ दोनों के लिए, लेकिन झूठा पेड़ केवल वास्तविक पेड़ का विकृत प्रतिबिंब है। प्रभु, सच्चे वृक्ष होने के कारण, यहाँ ब्रह्मा द्वारा स्वयं की ओर से और भगवान शिव की ओर से भी प्रणाम किए जाते हैं।
