श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.9.14 
शश्वत्स्वरूपमहसैव निपीतभेद-
मोहाय बोधधिषणाय नम: परस्मै ।
विश्वोद्भवस्थितिलयेषु निमित्तलीला-
रासाय ते नम इदं चकृमेश्वराय ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
मैं उस परम तत्व को प्रणाम करता हूँ, जो अपनी आंतरिक शक्ति से सदैव विशिष्ट स्थिति में रहते हैं। उनकी अविभाज्य, अव्यक्त विशेषता बुद्धि द्वारा आत्म-साक्षात्कार के लिए जानी जाती है। मैं उन्हें नमन करता हूँ, जो अपनी लीलाओं द्वारा विशाल ब्रह्मांड के निर्माण, संरक्षण और विनाश का आनंद लेते हैं।
 
मैं उस परम तत्व को प्रणाम करता हूँ, जो अपनी आंतरिक शक्ति से सदैव विशिष्ट स्थिति में रहते हैं। उनकी अविभाज्य, अव्यक्त विशेषता बुद्धि द्वारा आत्म-साक्षात्कार के लिए जानी जाती है। मैं उन्हें नमन करता हूँ, जो अपनी लीलाओं द्वारा विशाल ब्रह्मांड के निर्माण, संरक्षण और विनाश का आनंद लेते हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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