शश्वत्स्वरूपमहसैव निपीतभेद-
मोहाय बोधधिषणाय नम: परस्मै ।
विश्वोद्भवस्थितिलयेषु निमित्तलीला-
रासाय ते नम इदं चकृमेश्वराय ॥ १४ ॥
अनुवाद
मैं उस परम तत्व को प्रणाम करता हूँ, जो अपनी आंतरिक शक्ति से सदैव विशिष्ट स्थिति में रहते हैं। उनकी अविभाज्य, अव्यक्त विशेषता बुद्धि द्वारा आत्म-साक्षात्कार के लिए जानी जाती है। मैं उन्हें नमन करता हूँ, जो अपनी लीलाओं द्वारा विशाल ब्रह्मांड के निर्माण, संरक्षण और विनाश का आनंद लेते हैं।
I bow to the Supreme Brahman who by His intrinsic potency exists in an eternally distinct state. His indistinguishable impersonal form is recognized by the intellect for self-realization. I bow to Him who by His lila (pastimes) enjoys the creation, maintenance and destruction of the cosmic universe.
तात्पर्य
परम भगवान अपनी आंतरिक शक्तियों से सदा जीवित प्राणियों से भिन्न है, यद्यपि उनके निराकार स्वरूप को आत्मसाक्षात्कारी बुद्धि से भी जाना जा सकता है। इसलिए, परम भगवान के भक्त भगवान के निराकार स्वरूप को आदरपूर्वक प्रणाम करते हैं। यहाँ 'रासा' शब्द अर्थपूर्ण है। भगवान कृष्ण व्रज में गोपियों के साथ रास नृत्य करते हैं और भगवान गारभोदकशायी विष्णु अपनी बाह्य शक्ति के साथ भी रास का आनंद लेते हैं जिसके द्वारा वे समस्त भौतिक प्रकटीकरण को बनाते हैं, उसका पालन करते हैं और विघटन करते हैं। साथ ही, भगवान ब्रह्मा भगवान श्री कृष्ण को अपना सम्मानपूर्वक प्रणाम देते हैं, जो वास्तव में हमेशा गोपियों के साथ रास का आनंद लेते हैं, जैसा कि गोपाल-तापनी उपनिषद में निम्नलिखित शब्दों में पुष्टि की गई है: ''परार्धांते सोऽबुध्यता गोप-वेशो मे पुरुषः पुरस्ताद आविर्भभूव।'' भगवान और जीवित प्राणी के बीच का अंतर निश्चित रूप से तब अनुभव किया जाता है जब उनकी आंतरिक शक्ति को समझने के लिए पर्याप्त बुद्धि होती है, जैसा कि बाहरी शक्ति से अलग होता है जिसके द्वारा वे भौतिक प्रकटीकरण को संभव बनाते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥