पुंसामतो विविधकर्मभिरध्वराद्यै-
र्दानेन चोग्रतपसा परिचर्यया च ।
आराधनं भगवतस्तव सत्क्रियार्थो
धर्मोऽर्पित: कर्हिचिद्म्रियते न यत्र ॥ १३ ॥
अनुवाद
लेकिन वेदिक अनुष्ठान, दान, कठोर तपस्या तथा दिव्य सेवा जैसे पुण्य कार्य भी लाभप्रद होते हैं, जो लोग सकाम फलों को आपको अर्पित करके आपकी पूजा करने तथा आपको तुष्ट करने के उद्देश्य से करते हैं। धर्म के ऐसे कार्य व्यर्थ नहीं जाते।
But even pious acts such as Vedic rituals, charity, severe austerities and transcendental service, which are performed by people with the objective of worshipping You and satisfying You by offering fruitful results to You, are beneficial. Such acts of Dharma do not go waste.
तात्पर्य
पूर्ण भक्तिमय सेवा, जो नौ विभिन्न आध्यात्मिक गतिविधि- श्रवण, गायन, स्मरण, पूजा, प्रार्थना आदि- के माध्यम से संचालित की जाती है, हमेशा आडंबरपूर्ण प्रकृति वाले लोगों को आकर्षित नहीं करती है; वे वैदिक सतही अनुष्ठानों और सामाजिक धार्मिक कार्यक्रम के अन्य महंगे प्रदर्शनों से अधिक आकर्षित होते हैं। लेकिन वैदिक निषेधाज्ञाओं के अनुसार प्रक्रिया यह है कि सभी पवित्र गतिविधियों के फलों को सर्वोच्च भगवान को अर्पित किया जाना चाहिए। भगवद गीता (9.27) में, भगवान मांग करते हैं कि कोई भी व्यक्ति अपनी दैनिक गतिविधियों में, जैसे पूजा, यज्ञ और दान, जो कुछ भी करे, उसके सभी परिणाम केवल उसे अर्पित किए जाने चाहिए। पवित्र कृत्यों के परिणामों को सर्वोच्च भगवान को अर्पित करना भगवान के प्रति भक्ति सेवा का प्रतीक है और इसका स्थायी मूल्य है, जबकि उन्हीं परिणामों का आनंद लेना केवल अस्थायी है। भगवान की खातिर किया गया कोई भी कार्य एक स्थाई संपत्ति है और भगवान की मिश्रित भक्ति सेवा में क्रमिक प्रचार के लिए अदृश्य पवित्रता के रूप में जमा होता है। ये अज्ञात पवित्र गतिविधियां एक दिन सर्वोच्च भगवान की कृपा से पूर्ण भक्ति सेवा में परिणित होंगी। इसलिए, सर्वोच्च भगवान की खातिर किया गया कोई भी पवित्र कार्य उन लोगों के लिए भी यहां अनुशंसित है जो शुद्ध भक्त नहीं हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥