शुद्ध भक्त किसी भी भौतिक भोग के इच्छुक नहीं हैं, न ही वे इसके विपरीत हैं। वे अपनी इच्छाओं को भगवान की इच्छाओं के साथ पूरी तरह से जोड़ते हैं और अपने निजी खाते पर कुछ भी नहीं करते हैं। अर्जुन एक अच्छा उदाहरण है। अपने भाव पर, पारिवारिक लगाव के कारण, अर्जुन लड़ना नहीं चाहता था, लेकिन अंत में, श्रीमद भगवद-गीता को सुनने के बाद, वह भगवान के हित में लड़ने के लिए सहमत हो गया। इसलिए, भगवान शुद्ध भक्तों से बहुत संतुष्ट हैं क्योंकि वे इंद्रिय तृप्ति के लिए नहीं बल्कि केवल भगवान की इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं। परमात्मा के रूप में, या परमात्मा, वह हर किसी के हृदय में स्थित है, हमेशा हर किसी को अच्छी सलाह का मौका देता है। इसलिए हर किसी को यह अवसर लेना चाहिए और पूरी तरह से और पूरी तरह से उसे पारलौकिक प्रेमपूर्ण सेवा प्रदान करनी चाहिए।
हालांकि, अधर्मी न तो देवताओं की तरह हैं और न ही शुद्ध भक्तों की तरह हैं, बल्कि भगवान के साथ पारलौकिक संबंध के विरोधी हैं। उन्होंने प्रभु के विरुद्ध विद्रोह किया है और अपनी गतिविधियों की प्रतिक्रियाओं से लगातार गुजरना होगा।
भगवद-गीता (4.11) में कहा गया है: ये यथा माँ प्रपद्यते ताँस तथाईव भजाम्य अहम्। "हालांकि भगवान हर जीवित प्राणी के प्रति समान रूप से दयालु हैं, लेकिन जीवित प्राणी, अपने हिस्से के लिए, भगवान को अधिक या कम हद तक प्रसन्न करने में सक्षम हैं।" देवताओं को साकाम भक्त कहा जाता है, या भौतिक इच्छाओं वाले भक्त, जबकि शुद्ध भक्तों को निष्काम भक्त कहा जाता है क्योंकि उनकी अपनी व्यक्तिगत रुचियों की कोई इच्छा नहीं होती है। साकाम भक्त स्व-हितैषी होते हैं क्योंकि वे दूसरों के बारे में नहीं सोचते हैं, और इसलिए वे भगवान को पूरी तरह से संतुष्ट करने में सक्षम नहीं होते हैं, जबकि शुद्ध भक्त अधार्मिकों को भक्तों में बदलने की मिशनरी जिम्मेदारी लेते हैं, और इसलिए वे देवताओं की तुलना में भगवान को अधिक संतुष्ट करने में सक्षम हैं। अधर्मी लोगों की भगवान को कोई परवाह नहीं है, हालाँकि वह हर किसी के दिल में शुभचिंतकों और परमात्मा के रूप में विराजमान हैं। हालाँकि, वह उन्हें अपने शुद्ध भक्तों के माध्यम से अपनी दया प्राप्त करने का मौका भी देते हैं जो मिशनरी गतिविधियों में लगे हुए हैं। कभी-कभी प्रभु स्वयं मिशनरी गतिविधियों के लिए अवतरित होते हैं, जैसे उन्होंने भगवान चैतन्य के रूप में किया था, लेकिन ज्यादातर वह अपने वास्तविक प्रतिनिधि भेजते हैं, और इस प्रकार वह अधर्मी लोगों के प्रति अपनी अकारण दया दिखाते हैं। भगवान अपने शुद्ध भक्तों से इतने संतुष्ट हैं कि वह उन्हें मिशनरी सफलता का श्रेय देना चाहते हैं, हालांकि वह काम व्यक्तिगत रूप से कर सकते थे। साकाम भक्तों की तुलना में यह अपने शुद्ध, निष्काम भक्तों से उनकी संतुष्टि का प्रतीक है। ऐसी पारलौकिक गतिविधियों से प्रभु एक साथ पक्षपात के आरोप से मुक्त हो जाते हैं और भक्तों के साथ अपनी खुशी का प्रदर्शन करते हैं।
अब प्रश्न उठता है : अगर भगवान् अविश्वासियों के दिल में भी विराजमान हैं , तो फिर वे भक्त बनने को प्रेरित क्यों नहीं होते हैं ? इसका उत्तर यह हो सकता है कि ज़िद्दी अविश्वासी बंजर भूमि या क्षार वाले मैदान के समान हैं , जहां कोई भी कृषि संबंधी कार्य सफल नहीं हो सकता है । भगवान् के एक अविभाज्य अंग के रूप में प्रत्येक व्यक्ति के पास एक छोटी मात्रा में स्वतंत्रता होती है और इस छोटी स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके अविश्वासी , भगवान् और उनके शुद्ध भक्तों , जो प्रचार कार्य में लगे हुए हैं , दोनों के लिए अपराध करते रहते हैं । ऐसे कर्मों के परिणामस्वरूप वो क्षार मिट्टी की तरह बंजर हो जाते हैं , जहां उत्पन्न करने की कोई शक्ति नहीं होती है
