श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 9: सृजन-शक्ति के लिए ब्रह्मा द्वारा स्तुति  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.9.1 
ब्रह्मोवाच
ज्ञातोऽसि मेऽद्य सुचिरान्ननु देहभाजां
न ज्ञायते भगवतो गतिरित्यवद्यम् ।
नान्यत्त्वदस्ति भगवन्नपि तन्न शुद्धं
मायागुणव्यतिकराद्यदुरुर्विभासि ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी ने कहा: हे प्रभु, आज कई सालों की तपस्या के बाद मुझे आपका ज्ञान हुआ है। देहधारी जीव कितने दुर्भाग्यशाली हैं कि वे आपके स्वरूप को जानने में अक्षम हैं। हे स्वामी, आप ही एकमात्र जानने योग्य तत्व हैं, क्योंकि आपसे बड़ा कोई नहीं है। यदि कोई वस्तु आपसे श्रेष्ठ प्रतीत होती भी है, तो वह परम पूर्ण नहीं है। आप पदार्थ की सृजन शक्ति का प्रदर्शन करके ब्रह्म रूप में विराजमान हैं।
 
Brahma said: O Lord, today after many years of penance I have come to know about You. Oh! How unfortunate are the embodied beings that they are unable to know Your nature. O Lord, You are the only knowable element, because there is nothing supreme beyond You. Even if something appears superior to You, it is not the ultimate perfection. You exist in the form of Brahman, manifesting the creative power of matter.
तात्पर्य
जीवों की अज्ञानता का सबसे बड़ा शिखर उनकी शारीरिक बंधनता है और जिसके कारण वे ब्रह्मांड की उत्पत्ति के परम कारण से अनजान रह जाते हैं। भिन्न-भिन्न लोगों के पास परम कारण के अलग-अलग सिद्धांत हैं, किंतु उनमें से कोई भी वास्तविक नहीं हैं। केवल विष्णु ही परम कारण हैं, और उनके मायावी ऊर्जा ही बाधा स्वरूप है। प्रभु ने अपनी अद्भुत ऊर्जा का उपयोग भौतिक संसार में बहुत से अद्भुत व्याकुलता को प्रकट करने के लिए किया है और उसी ऊर्जा से भ्रमित होने वाले भौतिकवादी व्यक्ति परम कारण को कभी नहीं जान पाते हैं। इसलिए, सबसे मजबूत वैज्ञानिक और दार्शनिकों को भी अद्भुत नहीं माना जा सकता है। वे केवल यहाँ इसलिए अद्भुत प्रतीत होते हैं क्योंकि वे प्रभु की भ्रामक ऊर्जा के हाथों में औजार हैं। भ्रम के कारण, लोगों का सामान्य समूह सर्वोच्च प्रभु के अस्तित्व को नकारता है और भ्रामक ऊर्जा के मूर्खतापूर्ण उत्पादों को सर्वोच्च मानता है। कोई भी व्यक्ति ईश्वर के व्यक्तित्व के परम कारण को जान सकता है, जो प्रभु की अकारण दया से ही संभव है, जो ब्रह्मा जैसे प्रभु के शुद्ध भक्तों और उनके शिष्य के उत्तराधिकार पर ही आती है। तपस्या के कृत्यों से ही भगवान ब्रह्मा गर्भोदकशायी विष्णु को देख पाए और केवल साक्षात्कार द्वारा ही वे प्रभु को समझ पाए जैसे वो हैं। प्रभु के शानदार सौंदर्य और वैभव को देखने के बाद ब्रह्मा अत्यंत संतुष्ट हुए और उन्होंने स्वीकार किया कि उनके तुल्य कहीं कुछ नहीं है। केवल तपस्या से ही कोई प्रभु के वैभव और सौंदर्य को समझ सकता है और जब कोई उन सौंदर्य और वैभव से परिचित हो जाता है, तो वह अब और किसी अन्य चीज़ के प्रति आकर्षित नहीं होता है। भगवद् गीता (2.59) में इसी बात की पुष्टि की गई है: परं दृष्ट्वा निवर्तते। ब्रह्मा ने उन मूर्ख मानवों की निंदा की जो प्रभु के परम सौंदर्य और वैभव की खोज करने का प्रयास नहीं करते हैं। यह ज़रूरी है कि प्रत्येक मानव ऐसे ज्ञान की तलाश में प्रयत्नशील रहे, और अगर कोई ऐसा नहीं करता है तो उसका जीवन खराब हो जाता है। भौतिक अर्थों में जो कुछ भी सुंदर और वैभवपूर्ण है, उनका आनंद वे जीव ही लेते हैं जो कौओं की तरह होते हैं। कौआ हमेशा ख़ारिज किए हुए कचरे को चुनते हुए व्यस्त रहते हैं, जबकि सफेद बतख कौओं के साथ नहीं मिलते हैं। बल्कि, वे सुंदर उद्यानों से घिरी हुई कमल के फूलों वाली पारदर्शी झीलों में आनंद लेते हैं। निस्संदेह, कौआ और बतख दोनों ही जन्म से पक्षी हैं, लेकिन वे एक जैसे नहीं हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)