श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 8: गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का प्राकट्य  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.8.19 
स इत्थमुद्वीक्ष्य तदब्जनाल-
नाडीभिरन्तर्जलमाविवेश ।
नार्वाग्गतस्तत्खरनालनाल-
नाभिं विचिन्वंस्तदविन्दताज: ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
तब ब्रह्मदेव ने सोच-विचार करके कमल के डंठल के छेदों से होकर जल के अंदर प्रवेश किया। परंतु डंठल के भीतर प्रवेश करके तथा विष्णु की नाभि के काफ़ी पास जाकर भी वे मूल कारण का पता नहीं लगा पाए।
 
Thinking in this manner, Brahmaji entered the water through the pores of the lotus stem. But even after entering the stem and going closest to Vishnu's navel, he could not locate the root.
तात्पर्य
अपने निजी प्रयासों से मनुष्य भगवान को समीप तो पहुँच सकता है, किंतु भगवान की दया के बिना वह चरम बिंदु पर नहीं पहुँँच सकता। भगवान की इस तरह की समझ तभी संभव है यदि व्यक्ति प्रेममयी भक्ति सेवा में संलग्न हो, जैसा कि भगवद्गीता (18.55) में बताया गया है: ''भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः''।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)