श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  3.7.40 
एतान्मे पृच्छत: प्रश्नान् हरे: कर्मविवित्सया ।
ब्रूहि मेऽज्ञस्य मित्रत्वादजया नष्टचक्षुष: ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
हे मुनिवर, मैंने यह सभी प्रश्न इसलिए पूछे हैं क्योंकि मैं परम पुरुषोत्तम भगवान् हरि की लीलाओं को जानना चाहता हूँ। आप सभी के मित्र हैं, इसलिए कृपया इन लीलाओं का वर्णन उन सभी के लाभ के लिए करें, जिन्होंने अपनी दृष्टि खो दी है।
 
हे मुनिवर, मैंने यह सभी प्रश्न इसलिए पूछे हैं क्योंकि मैं परम पुरुषोत्तम भगवान् हरि की लीलाओं को जानना चाहता हूँ। आप सभी के मित्र हैं, इसलिए कृपया इन लीलाओं का वर्णन उन सभी के लाभ के लिए करें, जिन्होंने अपनी दृष्टि खो दी है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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