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श्लोक 3.7.22  |
यमाहुराद्यं पुरुषं सहस्राङ्घ्र्यूरुबाहुकम् ।
यत्र विश्व इमे लोका: सविकाशं त आसते ॥ २२ ॥ |
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| अनुवाद |
| कारण सागर में शयन करने वाले पुरुष अवतार को भौतिक सृष्टि में आदि पुरुष कहा जाता है और उनके विराट रूप में जिसमें सारे लोक तथा उनके निवासी रहते हैं, उस पुरुष के कई-कई हजार हाथ-पाँव होते हैं। |
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| कारण सागर में शयन करने वाले पुरुष अवतार को भौतिक सृष्टि में आदि पुरुष कहा जाता है और उनके विराट रूप में जिसमें सारे लोक तथा उनके निवासी रहते हैं, उस पुरुष के कई-कई हजार हाथ-पाँव होते हैं। |
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