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श्लोक 3.7.20  |
दुरापा ह्यल्पतपस: सेवा वैकुण्ठवर्त्मसु ।
यत्रोपगीयते नित्यं देवदेवो जनार्दन: ॥ २० ॥ |
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| अनुवाद |
| जिन व्यक्तियों की तपस्या क्षीण है, वे उन शुद्ध भक्तों की सेवा नहीं कर पाते जो भगवान के धाम वैकुण्ठ को प्राप्त करने के मार्ग पर अग्रसर होते हैं। शुद्ध भक्त शत-प्रतिशत परम प्रभु की महिमा के गायन में लगे रहते हैं, जो देवताओं के स्वामी तथा समस्त प्राणियों के नियंत्रक हैं। |
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| जिन व्यक्तियों की तपस्या क्षीण है, वे उन शुद्ध भक्तों की सेवा नहीं कर पाते जो भगवान के धाम वैकुण्ठ को प्राप्त करने के मार्ग पर अग्रसर होते हैं। शुद्ध भक्त शत-प्रतिशत परम प्रभु की महिमा के गायन में लगे रहते हैं, जो देवताओं के स्वामी तथा समस्त प्राणियों के नियंत्रक हैं। |
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