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श्लोक 3.7.19  |
यत्सेवया भगवत: कूटस्थस्य मधुद्विष: ।
रतिरासो भवेत्तीव्र: पादयोर्व्यसनार्दन: ॥ १९ ॥ |
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| अनुवाद |
| गुरु के चरणों में समर्पण करके ही व्यक्ति दिव्य एकांत में रहते हुए भगवान की सेवा में रमण कर सकता है और इसी रीति से वह मधु दैत्य का नाशक और भौतिक क्लेशों के हरणकर्ता भगवान की सेवा के योग्य बन सकता है। |
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| गुरु के चरणों में समर्पण करके ही व्यक्ति दिव्य एकांत में रहते हुए भगवान की सेवा में रमण कर सकता है और इसी रीति से वह मधु दैत्य का नाशक और भौतिक क्लेशों के हरणकर्ता भगवान की सेवा के योग्य बन सकता है। |
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