श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.7.18 
अर्थाभावं विनिश्चित्य प्रतीतस्यापि नात्मन: ।
तां चापि युष्मच्चरणसेवयाहं पराणुदे ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
परंतु, हे महोदय, मैं आपका आभारी हूँ, क्योंकि अब मैं समझ सकता हूँ कि यह भौतिक जगत् सारहीन है, यद्यपि यह वास्तविक प्रतीत होता है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपके पैरों की सेवा करके मेरे लिए इस झूठे विचार को त्याग सकना संभव हो सकेगा।
 
परंतु, हे महोदय, मैं आपका आभारी हूँ, क्योंकि अब मैं समझ सकता हूँ कि यह भौतिक जगत् सारहीन है, यद्यपि यह वास्तविक प्रतीत होता है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपके पैरों की सेवा करके मेरे लिए इस झूठे विचार को त्याग सकना संभव हो सकेगा।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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