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श्लोक 3.7.14  |
अशेषसंक्लेशशमं विधत्ते गुणानुवादश्रवणं मुरारे: ।
किं वा पुनस्तच्चरणारविन्दपरागसेवारतिरात्मलब्धा ॥ १४ ॥ |
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| अनुवाद |
| भगवान श्री कृष्ण के दिव्य नाम, सगुण और रूप का कीर्तन और श्रवण मात्र से ही मनुष्य की असीम कष्टप्रद परिस्थितियाँ समाप्त हो सकती हैं। तो फिर उनका क्या कहना जो भगवान के चरणकमलों की धूल की सुगंध की सेवा करने के लिए आकर्षित हो जाते हैं? |
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| भगवान श्री कृष्ण के दिव्य नाम, सगुण और रूप का कीर्तन और श्रवण मात्र से ही मनुष्य की असीम कष्टप्रद परिस्थितियाँ समाप्त हो सकती हैं। तो फिर उनका क्या कहना जो भगवान के चरणकमलों की धूल की सुगंध की सेवा करने के लिए आकर्षित हो जाते हैं? |
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