| श्रीमद् भागवतम » स्कन्ध 3: यथास्थिति » अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न » श्लोक 12 |
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| | | | श्लोक 3.7.12  | स वै निवृत्तिधर्मेण वासुदेवानुकम्पया ।
भगवद्भक्तियोगेन तिरोधत्ते शनैरिह ॥ १२ ॥ | | | | | | अनुवाद | | किन्तु उस आत्म-पहचान की गलतफहमी को भगवान वासुदेव की दया से, विरक्तिभाव से भगवान की भक्तिमय सेवा की प्रक्रिया से धीरे-धीरे कम किया जा सकता है। | | | | किन्तु उस आत्म-पहचान की गलतफहमी को भगवान वासुदेव की दया से, विरक्तिभाव से भगवान की भक्तिमय सेवा की प्रक्रिया से धीरे-धीरे कम किया जा सकता है। | | ✨ ai-generated | | |
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