श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.7.10 
यदर्थेन विनामुष्य पुंस आत्मविपर्यय: ।
प्रतीयत उपद्रष्टु: स्वशिरश्छेदनादिक: ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
जीव अपनी आत्म-पहचान को लेकर परेशान रहता है। उसके पास कोई वास्तविक आधार नहीं होता, जैसे कोई व्यक्ति सपना देख रहा हो और उसे लगे कि उसका सिर कट गया है।
 
जीव अपनी आत्म-पहचान को लेकर परेशान रहता है। उसके पास कोई वास्तविक आधार नहीं होता, जैसे कोई व्यक्ति सपना देख रहा हो और उसे लगे कि उसका सिर कट गया है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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