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bhagavat 3.7.1: श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हे राजा, जब महर्षि मैत्रेय इस प्रकार से बोल रहे थे तो द्वैपायन व्यास के विद्वान पुत्र विदुर ने यह प्रश्न पूछते समय अत्यंत मधुर ढंग से एक अनुरोध व्यक्त किया।   |   bhagavat अध्याय 3.7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न   ।   bhagavat स्कन्ध 3: यथास्थिति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.7.1 
श्रीशुक उवाच
एवं ब्रुवाणं मैत्रेयं द्वैपायनसुतो बुध: ।
प्रीणयन्निव भारत्या विदुर: प्रत्यभाषत ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हे राजा, जब महर्षि मैत्रेय इस प्रकार से बोल रहे थे तो द्वैपायन व्यास के विद्वान पुत्र विदुर ने यह प्रश्न पूछते समय अत्यंत मधुर ढंग से एक अनुरोध व्यक्त किया।
 
Sri Sukadeva Goswami said: O King, when the great sage Maitreya was speaking in this manner, Vidura, the learned son of Dwaipayana Vyasa, sweetly expressed a request by asking this question.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)