श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.6.7 
स वै विश्वसृजां गर्भो देवकर्मात्मशक्तिमान् ।
विबभाजात्मनात्मानमेकधा दशधा त्रिधा ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
महत्-तत्त्व की संपूर्ण शक्ति ने विराट रूप धारण कर स्वयं को जीवों की चेतना, क्रियाशीलता और आत्म-पहचान के रूप में विभाजित कर लिया, जो क्रमशः एक, दस और तीन में उप-विभाजित हैं।
 
महत्-तत्त्व की संपूर्ण शक्ति ने विराट रूप धारण कर स्वयं को जीवों की चेतना, क्रियाशीलता और आत्म-पहचान के रूप में विभाजित कर लिया, जो क्रमशः एक, दस और तीन में उप-विभाजित हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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