श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  3.6.40 
यतोऽप्राप्य न्यवर्तन्त वाचश्च मनसा सह ।
अहं चान्य इमे देवास्तस्मै भगवते नम: ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
शब्दों, मन और अहंकार समेत उनके संबंधित नियंत्रक देवता, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान को जानने में असफल रहे हैं। इसीलिए हमें अपने विवेक का उपयोग करते हुए उन्हें श्रद्धापूर्वक नमस्कार करना चाहिए।
 
शब्दों, मन और अहंकार समेत उनके संबंधित नियंत्रक देवता, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान को जानने में असफल रहे हैं। इसीलिए हमें अपने विवेक का उपयोग करते हुए उन्हें श्रद्धापूर्वक नमस्कार करना चाहिए।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध तीन के अंतर्गत छठा अध्याय समाप्त होता है ।
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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