श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.6.4 
प्रबुद्धकर्मा दैवेन त्रयोविंशतिको गण: ।
प्रेरितोऽजनयत्स्वाभिर्मात्राभिरधिपूरुषम् ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
जब परम पुरुष ने अपनी इच्छा से तेईस प्रमुख तत्वों को प्रेरित किया तो भगवान का विशाल सार्वभौमिक रूप या विश्वरूप शरीर अस्तित्व में आ गया।
 
जब परम पुरुष ने अपनी इच्छा से तेईस प्रमुख तत्वों को प्रेरित किया तो भगवान का विशाल सार्वभौमिक रूप या विश्वरूप शरीर अस्तित्व में आ गया।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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