मानव जीवन में आत्मा इस भ्रम में रहती है कि वह विश्व का स्वामी बन सकता है और इस भ्रम की अंतिम सीमा यह सोचना है कि वहस्वयं सर्वोच्च स्वामी है। मूर्ख आत्मा इस तथ्य पर ध्यान नहीं देती कि सर्वोच्च को माया या भ्रम सीमित नहीं कर सकता। अगर सर्वोच्च माया से सीमित हो जाए तो उसकी श्रेष्ठता किस बात में रह जाएगी? उस स्थिति मे माया या भ्रम ही सर्वोच्च हो जाएगा। इसलिए क्योंकि जीव सीमित है, वे सर्वोच्च नहीं हो सकते। सीमित जीव की वास्तविक स्थिति को यह श्लोक समझा रहा है: प्रकृति के तीनों गुणों से संपर्क होने की वजह से सीमित जीव अशुद्ध होते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि वे प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में अपने आप को शुद्ध करें। गुरु न केवल योग्यता के आधार पर ब्राह्मण होता है बल्कि उसे वैष्णव भी होना चाहिए। इस श्लोक में उल्लेखित यह एकमात्र आत्मशुद्धि की प्रक्रिया है कि भगवान की प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु के निर्देशन में ही पूजा की जाए। यह शुद्धि का प्राकृतिक तरीका है और किसी दूसरे तरीके को प्रामाणिक नहीं माना गया है। शुद्धि के अन्य तरीके जीवन के इस चरण तक आने के लिए सहायक हो सकते हैं किंतु अंततः सही मायनों में परिपूर्णता हासिल करने के पहले इंसान को इस अंतिम चरण तक आना ही होता है। भगवद्गीता (7.19) इस सच्चाई की पुष्टि इस प्रकार करती है:
बहूनां जन्मानमन्ते
ज्ञानी माँ प्रपद्यते
वासुदेवः सर्वमिति
स महात्मा सुदुर्लभः
