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श्लोक 3.6.31  |
बाहुभ्योऽवर्तत क्षत्रं क्षत्रियस्तदनुव्रत: ।
यो जातस्त्रायते वर्णान् पौरुष: कण्टकक्षतात् ॥ ३१ ॥ |
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| अनुवाद |
| तत्पश्चात् विशाल विराट रूप की बाहुओं से रक्षा करने की शक्ति उत्पन्न हुई और इस शक्ति के सन्दर्भ में क्षत्रिय सिद्धांत का पालन करते हुए समाज की चोरों और दुष्टों के आतंक से रक्षा करने के कारण ही क्षत्रिय भी अस्तित्व में आए। |
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| तत्पश्चात् विशाल विराट रूप की बाहुओं से रक्षा करने की शक्ति उत्पन्न हुई और इस शक्ति के सन्दर्भ में क्षत्रिय सिद्धांत का पालन करते हुए समाज की चोरों और दुष्टों के आतंक से रक्षा करने के कारण ही क्षत्रिय भी अस्तित्व में आए। |
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