श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.6.29 
तार्तीयेन स्वभावेन भगवन्नाभिमाश्रिता: ।
उभयोरन्तरं व्योम ये रुद्रपार्षदां गणा: ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
रुद्र के सहयोगी जीव प्रकृति के तीसरे गुण, यानि अज्ञानता में विकास करते हैं। वे पृथ्वी के ग्रहों और स्वर्गीय ग्रहों के बीच आकाश में स्थित होते हैं।
 
The living beings who are companions of Rudra develop in the third quality of nature, that is Tamoguna. They are situated in the sky between the earthly planets and the heavenly planets.
तात्पर्य
आकाश के इस मध्य भाग को भुवर्लोक कहते हैं, जैसा कि श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती और श्रील जीव गोस्वामी दोनों द्वारा पुष्टि की गई है। भगवद्-गीता में कहा गया है कि जो लोग रजोगुण में विकसित होते हैं, वे मध्य क्षेत्र में स्थित होते हैं। जो सतोगुण में स्थित होते हैं, वे देवताओं के क्षेत्रों में पदोन्नत होते हैं, जो रजोगुण में स्थित होते हैं, उन्हें मानव समाज में रखा जाता है, और जो तमोगुण में स्थित होते हैं, उन्हें जानवरों या भूतों के समाज में रखा जाता है। इस निष्कर्ष में कोई विरोधाभास नहीं है। असंख्य जीवित संस्थाएँ पूरे ब्रह्मांड में विभिन्न ग्रहों में वितरित की जाती हैं और भौतिक प्रकृति के मोड में अपने स्वयं के गुणों के संदर्भ में स्थित होती हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)