श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  3.6.16 
निर्भिन्नान्यस्य चर्माणि लोकपालोऽनिलोऽविशत् ।
प्राणेनांशेन संस्पर्शं येनासौ प्रतिपद्यते ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
जब विराट रूप से त्वचा अलग हुई, तो वायु के नियंत्रक देव अनिल आंशिक स्पर्श के साथ प्रविष्ट हुए, जिससे जीव स्पर्श की अनुभूति कर सकते हैं।
 
When the skin was separated from the vast form, the god Anil, the director of air, entered with partial touch through which the living beings could experience the touch.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)