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श्लोक 3.6.14  |
निर्भिन्ने अश्विनौ नासे विष्णोराविशतां पदम् ।
घ्राणेनांशेन गन्धस्य प्रतिपत्तिर्यतो भवेत् ॥ १४ ॥ |
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| अनुवाद |
| जब भगवान के दोनों नासिका द्वार अलग-अलग प्रकट हुए, तब जुड़वां अश्विनी कुमार अपनी-अपनी जगहों पर उनमें प्रवेश कर गए और इसके कारण ही जीव प्रत्येक वस्तु की गंध सूँघ सकते हैं। |
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| जब भगवान के दोनों नासिका द्वार अलग-अलग प्रकट हुए, तब जुड़वां अश्विनी कुमार अपनी-अपनी जगहों पर उनमें प्रवेश कर गए और इसके कारण ही जीव प्रत्येक वस्तु की गंध सूँघ सकते हैं। |
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