श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.5.8 
यैस्तत्त्वभेदैरधिलोकनाथो
लोकानलोकान् सह लोकपालान् ।
अचीक्लृपद्यत्र हि सर्वसत्त्व-
निकायभेदोऽधिकृत: प्रतीत: ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
सारे राजाओं के सबसे बड़े राजा ने अलग-अलग लोकों तथा निवास स्थलों की रचना की है जहाँ जीव प्रकृति के गुणों और कर्म के आधार पर स्थित होते हैं तथा उसने उनके अलग-अलग शासक और राजाओं की रचना की है।
 
The Supreme King of all kings created the various worlds and places of abode where all living entities are located according to the qualities and actions of nature, and He also created their various kings and rulers.
तात्पर्य
भगवान कृष्ण समस्त राजाओं के प्रधान राजा हैं और उन्होंने सभी प्रकार के जीवों के लिए विभिन्न ग्रहों की रचना की है। यहाँ तक कि इस धरती पर भी अलग-अलग प्रकार के लोगों के रहने के लिए अलग-अलग स्थान हैं। रेगिस्तान, बर्फ से ढँकी भूमि और पहाड़ी देशों में घाटियाँ जैसी जगहें हैं। प्रत्येक स्थान पर अलग-अलग प्रकृति वाले लोगों का जन्म उनके पिछले कर्मों के अनुसार हुआ है। अरब के रेगिस्तान और हिमालय पर्वत की घाटियों में लोग रहते हैं। इन जगहों के निवासी एक-दूसरे से अलग हैं, ठीक वैसे ही जैसे बर्फ से ढकी धरती के निवासी उनसे भिन्न हैं। इसी तरह अलग-अलग ग्रह भी हैं। पृथ्वी के नीचे पाताल लोक तक कई ग्रहों पर विभिन्न प्रकार के जीव रहते हैं। कोई भी ग्रह खाली नहीं है, जैसा कि हमारे वर्तमान तथाकथित वैज्ञानिकों ने गलत कल्पना की है। भगवद्गीता में हम देखते हैं कि भगवान ने कहा है कि जीव 'सर्वगत' हैं, यानि कि जीवन के हर क्षेत्र में मौजूद हैं। तो इसमें कोई संदेह नहीं है कि अन्य ग्रहों पर भी हमारी तरह ही जीव रहते हैं, कभी-कभी उनमें हमसे अधिक विवेक और अधिक संपन्नता भी होती है। अधिक बुद्धिमान लोगों के रहने की स्थिति इस धरती की तुलना में अधिक वैभवशाली है। ऐसे ग्रह भी हैं जहाँ सूर्य की रोशनी नहीं पहुँचती और वहाँ ऐसे जीव रहते हैं जो अपने पिछले कर्मों के कारण वहाँ रहने को मजबूर हैं। रहने की स्थिति के लिए ऐसी सभी योजनाएँ सर्वोच्च भगवान द्वारा बनाई गई हैं और विदुर ने मैत्रेय से अनुरोध किया कि वे अधिक ज्ञानवर्धन के लिए इसका वर्णन करें।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)