श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.5.7 
क्रीडन् विधत्ते द्विजगोसुराणां
क्षेमाय कर्माण्यवतारभेदै: ।
मनो न तृप्यत्यपि श‍ृण्वतां न:
सुश्लोकमौलेश्चरितामृतानि ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
आप द्विजों, गायों और देवताओं के कल्याण के लिए भगवान के अलग-अलग अवतारों के शुभ लक्षणों के बारे में भी बता सकते हैं। हालाँकि, हम लगातार उनके दिव्य कार्यों के बारे में सुनते रहते हैं, लेकिन हमारे मन कभी पूरी तरह से संतुष्ट नहीं होते।
 
Please also describe the auspicious signs of the various incarnations of the Lord for the welfare of the twice-born, cows and demigods. Although we constantly hear about His transcendental activities, our minds are never fully satisfied.
तात्पर्य
प्रभु इस ब्रह्मांड में मत्स्य, कूर्म, वराह और नृसिंह जैसे विभिन्न अवतारों में प्रकट होते हैं और वे दो बार जन्म लेने वालों, गायों और देवताओं के हित के लिए अपनी विभिन्न अलौकिक गतिविधियों को अभिव्यक्त करते हैं। भगवान का सीधा संबंध दो बार जन्म लेने वालों या सभ्य लोगों से है। सभ्य व्यक्ति वह होता है जो दो बार जन्म लेता है। एक जीवित प्राणी पुरुष और स्त्री के मिलन से इस सांसारिक दुनिया में जन्म लेता है। एक मनुष्य पिता और माता के मिलन से जन्म लेता है, लेकिन एक सभ्य मनुष्य का एक आध्यात्मिक गुरु के संपर्क से दूसरा जन्म होता है, जो वास्तविक पिता बन जाता है। भौतिक शरीर के पिता और माता केवल एक जन्म में ही होते हैं और अगले जन्म में पिता और माता एक अलग युगल हो सकते हैं। लेकिन भगवान के प्रतिनिधि के रूप में वास्तविक आध्यात्मिक गुरु शाश्वत पिता होते हैं क्योंकि आध्यात्मिक गुरु के पास शिष्य को आध्यात्मिक उद्धार या जीवन के अंतिम लक्ष्य तक ले जाने की जिम्मेदारी होती है। इसलिए, एक सभ्य व्यक्ति को दो बार जन्म लेना होगा, अन्यथा वह निचले पशुओं से अधिक नहीं है।

मानव शरीर को पूर्णता तक विकसित करने के लिए गाय सबसे महत्वपूर्ण जानवर है। शरीर को किसी भी तरह के खाद्य पदार्थ से बनाए रखा जा सकता है, लेकिन गाय का दूध विशेष रूप से मानव मस्तिष्क के महीन ऊतकों को विकसित करने के लिए आवश्यक है ताकि व्यक्ति पारलौकिक ज्ञान की पेचीदगियों को समझ सके। एक सभ्य व्यक्ति से उम्मीद की जाती है कि वह फल, सब्जियां, अनाज, चीनी और दूध से युक्त खाद्य पदार्थों पर जीवित रहेगा। बैल अनाज आदि के उत्पादन की कृषि प्रक्रिया में मदद करता है, और इस प्रकार एक अर्थ में बैल मानव जाति का पिता है, जबकि गाय माँ है, क्योंकि वह मानव समाज को दूध देती है। इसलिए एक सभ्य व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह सभी बैलों और गायों को सुरक्षा प्रदान करे।

देवता या उच्च ग्रहों पर रहने वाले जीवित प्राणी मानवों से कहीं श्रेष्ठ हैं। चूँकि उनके पास रहने की स्थिति के लिए बेहतर व्यवस्था है, वे मानवों की तुलना में अधिक विलासितापूर्ण जीवन जीते हैं, फिर भी वे सभी भगवान के भक्त हैं। भगवान मछली, कछुआ, सूअर और एक संयुक्त शेर और मानव जैसे विभिन्न रूपों में अवतार लेते हैं, ताकि सभ्य मनुष्य, गाय और देवताओं को सुरक्षा प्रदान की जा सके, जो प्रगतिशील आत्म-साक्षात्कार के नियमन जीवन के लिए सीधे जिम्मेदार हैं। भौतिक सृष्टि की पूरी व्यवस्था इस तरह से बनाई गई है कि बद्ध आत्माओं को आत्म-साक्षात्कार का अवसर मिल सके। जो इस तरह की व्यवस्था का लाभ उठाता है उसे देवता या सभ्य व्यक्ति कहा जाता है। गाय का उद्देश्य जीवन का ऐसा उच्च स्तर बनाए रखने में मदद करना है।

भगवान द्वारा दो बार जन्म लेने वाले सभ्य पुरुषों, गायों और देवताओं की सुरक्षा के लिए किए गए भगवान के मनोरंजन सभी पारलौकिक हैं। एक मनुष्य अच्छे वृत्तांत और कहानियाँ सुनने के लिए प्रवृत्त होता है, इसलिए विकसित आत्मा के हितों को पूरा करने के लिए बाजार में बहुत सारी किताबें, पत्रिकाएँ और समाचार पत्र हैं। लेकिन इस तरह के साहित्य में, एक बार पढ़ने के बाद इसका आनंद फीका पड़ जाता है, और लोगों को इस तरह के साहित्य को बार-बार पढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं होती है। वास्तव में, अखबार एक घंटे से भी कम समय के लिए पढ़े जाते हैं और फिर कूड़े के डिब्बे में फेंक दिए जाते हैं। अन्य सभी सांसारिक साहित्यों की भी यही स्थिति है। लेकिन भगवद् गीता और श्रीमद् भागवतम् जैसे पारलौकिक साहित्यों की खूबसूरती यह है कि ये कभी पुराने नहीं होते। दुनिया में उन्हें पिछले पाँच हज़ार सालों से सभ्य मनुष्य पढ़ रहे हैं और वे कभी पुराने नहीं हुए हैं। वे विद्वान विद्वानों और भक्तों के लिए हमेशा नए रहते हैं और यहाँ तक कि भगवद् गीता और श्रीमद भागवतम् के छंदों की दैनिक पुनरावृत्ति से भी विदुर जैसे भक्तों के लिए कोई तृप्ति नहीं है। यही भगवान के गौरवशाली लीलाओं की पारलौकिक प्रकृति है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)