मानव शरीर को पूर्णता तक विकसित करने के लिए गाय सबसे महत्वपूर्ण जानवर है। शरीर को किसी भी तरह के खाद्य पदार्थ से बनाए रखा जा सकता है, लेकिन गाय का दूध विशेष रूप से मानव मस्तिष्क के महीन ऊतकों को विकसित करने के लिए आवश्यक है ताकि व्यक्ति पारलौकिक ज्ञान की पेचीदगियों को समझ सके। एक सभ्य व्यक्ति से उम्मीद की जाती है कि वह फल, सब्जियां, अनाज, चीनी और दूध से युक्त खाद्य पदार्थों पर जीवित रहेगा। बैल अनाज आदि के उत्पादन की कृषि प्रक्रिया में मदद करता है, और इस प्रकार एक अर्थ में बैल मानव जाति का पिता है, जबकि गाय माँ है, क्योंकि वह मानव समाज को दूध देती है। इसलिए एक सभ्य व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह सभी बैलों और गायों को सुरक्षा प्रदान करे।
देवता या उच्च ग्रहों पर रहने वाले जीवित प्राणी मानवों से कहीं श्रेष्ठ हैं। चूँकि उनके पास रहने की स्थिति के लिए बेहतर व्यवस्था है, वे मानवों की तुलना में अधिक विलासितापूर्ण जीवन जीते हैं, फिर भी वे सभी भगवान के भक्त हैं। भगवान मछली, कछुआ, सूअर और एक संयुक्त शेर और मानव जैसे विभिन्न रूपों में अवतार लेते हैं, ताकि सभ्य मनुष्य, गाय और देवताओं को सुरक्षा प्रदान की जा सके, जो प्रगतिशील आत्म-साक्षात्कार के नियमन जीवन के लिए सीधे जिम्मेदार हैं। भौतिक सृष्टि की पूरी व्यवस्था इस तरह से बनाई गई है कि बद्ध आत्माओं को आत्म-साक्षात्कार का अवसर मिल सके। जो इस तरह की व्यवस्था का लाभ उठाता है उसे देवता या सभ्य व्यक्ति कहा जाता है। गाय का उद्देश्य जीवन का ऐसा उच्च स्तर बनाए रखने में मदद करना है।
भगवान द्वारा दो बार जन्म लेने वाले सभ्य पुरुषों, गायों और देवताओं की सुरक्षा के लिए किए गए भगवान के मनोरंजन सभी पारलौकिक हैं। एक मनुष्य अच्छे वृत्तांत और कहानियाँ सुनने के लिए प्रवृत्त होता है, इसलिए विकसित आत्मा के हितों को पूरा करने के लिए बाजार में बहुत सारी किताबें, पत्रिकाएँ और समाचार पत्र हैं। लेकिन इस तरह के साहित्य में, एक बार पढ़ने के बाद इसका आनंद फीका पड़ जाता है, और लोगों को इस तरह के साहित्य को बार-बार पढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं होती है। वास्तव में, अखबार एक घंटे से भी कम समय के लिए पढ़े जाते हैं और फिर कूड़े के डिब्बे में फेंक दिए जाते हैं। अन्य सभी सांसारिक साहित्यों की भी यही स्थिति है। लेकिन भगवद् गीता और श्रीमद् भागवतम् जैसे पारलौकिक साहित्यों की खूबसूरती यह है कि ये कभी पुराने नहीं होते। दुनिया में उन्हें पिछले पाँच हज़ार सालों से सभ्य मनुष्य पढ़ रहे हैं और वे कभी पुराने नहीं हुए हैं। वे विद्वान विद्वानों और भक्तों के लिए हमेशा नए रहते हैं और यहाँ तक कि भगवद् गीता और श्रीमद भागवतम् के छंदों की दैनिक पुनरावृत्ति से भी विदुर जैसे भक्तों के लिए कोई तृप्ति नहीं है। यही भगवान के गौरवशाली लीलाओं की पारलौकिक प्रकृति है।
