वैदिक ज्ञान का विस्तार नित्य-बधाओं, बद्ध जीवों को भी सुधार करने का मौका देता है, और जो लोग इस तरह के पारलौकिक ज्ञान का लाभ उठाते हैं, वे धीरे-धीरे भगवान को पारलौकिक प्रेमपूर्ण सेवा प्रदान करने की अपनी खोई हुई चेतना को पुनः प्राप्त कर लेते हैं। देवता उन बद्ध आत्माओं में से हैं जिन्होंने भगवान की सेवा की इस शुद्ध चेतना को विकसित किया है, लेकिन साथ ही वे भौतिक ऊर्जा पर प्रभुत्व स्थापित करने की इच्छा भी रखते हैं। ऐसी मिश्रित चेतना एक बद्ध आत्मा को इस सृष्टि के मामलों को प्रबंधित करने की स्थिति में रखती है। देवताओं को बद्ध आत्माओं का नेता सौंपा गया है। चूँकि सरकारी जेलों में कुछ पुराने कैदियों को जेल प्रबंधन का कुछ जिम्मेदार कार्य सौंपा जाता है, इसलिए देवता भौतिक सृष्टि में भगवान के प्रतिनिधियों के रूप में कार्य करने वाली उन्नत आत्माएँ हैं। ऐसे देवता भौतिक जगत में भगवान के भक्त होते हैं, और जब वे भौतिक ऊर्जा पर प्रभुत्व स्थापित करने की सभी भौतिक इच्छा से पूरी तरह मुक्त हो जाते हैं तो वे शुद्ध भक्त बन जाते हैं और भगवान की सेवा करने के अलावा उनकी कोई इच्छा नहीं होती है। इसलिए कोई भी जीवित इकाई जो भौतिक संसार में एक पद की इच्छा रखती है, वह भगवान की सेवा में इसकी इच्छा कर सकती है और भगवान से शक्ति और बुद्धि की मांग कर सकती है, जैसा कि इस विशेष श्लोक में देवताओं द्वारा उदाहरण दिया गया है। कोई तब तक कुछ नहीं कर सकता जब तक कि वह प्रभु द्वारा प्रबुद्ध और सशक्त न हो। भगवद गीता (15.15) में भगवान कहते हैं, मत्तः स्मृति ज्ञानम् अपोहनम् च। सभी स्मृतियाँ, ज्ञान आदि, साथ ही सभी विस्मृति, भगवान द्वारा बनाई गई हैं, जो हर किसी के दिल में बैठे हैं। बुद्धिमान व्यक्ति भगवान की सहायता चाहता है, और भगवान अपनी विविध सेवाओं में लगे ईमानदार भक्तों की सहायता करते हैं।
भगवान ने देवताओं को उनके पिछले कर्मों के अनुसार जीवों की विभिन्न प्रजातियाँ बनाने का काम सौंपा है। वे यहां अपने कार्य को पूरा करने के लिए बुद्धि और शक्ति के लिए भगवान की कृपा मांग रहे हैं। इसी प्रकार, कोई भी बद्ध आत्मा एक विशेषज्ञ आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में भगवान की सेवा में संलग्न हो सकती है और इस प्रकार धीरे-धीरे भौतिक अस्तित्व के बंधन से मुक्त हो सकती है। आध्यात्मिक गुरु भगवान का प्रकट प्रतिनिधि है, और जो कोई भी खुद को आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन में रखता है और उसके अनुसार कार्य करता है, उसे बुद्धि-योग के संदर्भ में कार्य करने वाला कहा जाता है, जैसा कि भगवद गीता (2.41) में बताया गया है:
व्यवसायात्मिका बुद्धिर
एकेहा कुरु-नंदन
बहु-शाखा ह्य अनन्तश च
बुद्धयोऽव्यवासयिनम्
