यावद्बलिं तेऽज हराम काले
यथा वयं चान्नमदाम यत्र ।
यथोभयेषां त इमे हि लोका
बलिं हरन्तोऽन्नमदन्त्यनूहा: ॥ ४९ ॥
अनुवाद
हे अजन्में प्रभु, आप हमें वे उपाय बताइए जिनसे हम आपको सब प्रकार के स्वादिष्ट अन्न और वस्तुएँ अर्पित कर सकें जिससे हम और इस संसार के सभी जीव बिना किसी बाधा के अपना पोषण कर सकें और आपके और अपने लिए आवश्यक संसाधनों का संचय कर सकें।
O Unborn One, please tell us the way and the means by which we can offer You all the eatable food and articles so that we and all the other living entities in this world can sustain ourselves without any disturbance and collect the necessary articles for ourselves and You.
तात्पर्य
जागरूकता का विकास मानव के जीवन से प्रारंभ होता है और उच्च ग्रहों पर रहने वाले देवताओं के जीवन में और अधिक बढ़ जाता है। पृथ्वी लगभग ब्रह्मांड के बीच में स्थित है, और मानवीय जीवन देवताओं और राक्षसों के जीवन के मध्य की अवस्था है। पृथ्वी के ऊपर के ग्रह प्रणालियाँ विशेष रूप से उच्च बुद्धिमानों के लिए हैं, जिन्हें देवता कहा जाता है। उन्हें देवता इसलिए कहा जाता है क्योंकि यद्यपि उनके जीवन का स्तर संस्कृति, आनंद, विलासिता, सुंदरता, शिक्षा और जीवनकाल में बहुत अधिक उन्नत है, लेकिन वे हमेशा भगवान के प्रति पूर्ण रूप से जागरूक रहते हैं। ऐसे देवता हमेशा सर्वोच्च प्रभु की सेवा करने के लिए तैयार रहते हैं क्योंकि वे इस तथ्य से पूरी तरह अवगत हैं कि प्रत्येक जीवित इकाई संवैधानिक रूप से भगवान का एक शाश्वत अधीनस्थ सेवक है। वे यह भी जानते हैं कि केवल भगवान ही हैं जो सभी जीवित संस्थाओं को जीवन की सभी आवश्यकताओं के साथ बनाए रख सकते हैं। वैदिक भजन, एको बाहुनां यो विदधाति कामन, ता एनम अरुवन्न आयनम नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्न अदामे, आदि, इस सत्य की पुष्टि करते हैं। भगवद-गीता में भी, भगवान को भूत-भृत् या सभी जीवित प्राणियों के पालनहार के रूप में वर्णित किया गया है। आधुनिक सिद्धांत कि भुखमरी जनसंख्या वृद्धि के कारण है, देवताओं या प्रभु के भक्तों द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता है। भक्त या देवता पूरी तरह से जानते हैं कि प्रभु किसी भी संख्या में जीवित संस्थाओं का भरण-पोषण कर सकते हैं, बशर्ते उन्हें पता हो कि कैसे खाना है। यदि वे सामान्य जानवरों की तरह खाना चाहते हैं, जिनके पास ईश्वरीय चेतना नहीं है, तो उन्हें जंगल में जंगली जानवरों की तरह भुखमरी, गरीबी और अभाव में रहना होगा। जंगली जानवरों को भी भगवान अपने भोजन से पालते हैं, लेकिन वे ईश्वरीय चेतना में उन्नत नहीं हैं। इसी तरह, मनुष्यों को भगवान की कृपा से अनाज, सब्जियां, फल और दूध प्रदान किया जाता है, लेकिन यह मनुष्य का कर्तव्य है कि वह भगवान की दया को स्वीकार करे। आभार के तौर पर, उन्हें भोजन सामग्री की आपूर्ति के लिए भगवान को बाध्य महसूस करना चाहिए, और उन्हें पहले उन्हें बलिदान में भोजन अर्पित करना चाहिए और फिर शेष भाग का भक्षण करना चाहिए। भगवद-गीता (3.13) में इस बात की पुष्टि की गई है कि जो व्यक्ति बलिदान करने के बाद भोजन करता है, वह शरीर और आत्मा के उचित रखरखाव के लिए असली भोजन खाता है, लेकिन जो अपने लिए खाना बनाता है और कोई बलिदान नहीं करता है, वह भोजन के आकार में केवल पाप के टुकड़े खाता है। इस तरह का पापपूर्ण भोजन कभी भी किसी को सुखी या अभाव से मुक्त नहीं कर सकता है। अकाल जनसंख्या वृद्धि के कारण नहीं होता है, जैसा कि कम बुद्धिमान अर्थशास्त्री सोचते हैं। जब मानव समाज जीवित संस्थाओं के भरण-पोषण के लिए भगवान के सभी उपहारों के लिए उनका आभारी होता है, तो निश्चित रूप से समाज में कोई कमी या अभाव नहीं होता है। लेकिन जब मनुष्य भगवान के ऐसे उपहारों के आंतरिक मूल्य से अनजान होते हैं, तो निश्चित रूप से वे चाहते हैं। एक व्यक्ति जिसके पास ईश्वरीय चेतना नहीं है, वह अपने पिछले पुण्य कर्मों के कारण कुछ समय के लिए संपन्नता में रह सकता है, लेकिन यदि कोई भगवान के साथ अपने संबंध को भूल जाता है, तो निश्चित रूप से उसे शक्तिशाली भौतिक प्रकृति के नियम से भुखमरी की स्थिति का इंतजार करना होगा। कोई भी शक्तिशाली भौतिक प्रकृति की सतर्कता से बच नहीं सकता जब तक कि वह ईश्वरीय चेतना या भक्तिमय जीवन नहीं जीता।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥