तत्ते वयं लोकसिसृक्षयाद्य
त्वयानुसृष्टास्त्रिभिरात्मभि: स्म ।
सर्वे वियुक्ता: स्वविहारतन्त्रं
न शक्नुमस्तत्प्रतिहर्तवे ते ॥ ४८ ॥
अनुवाद
हे आदि पुरुष, इसलिए हम एकमात्र आपके हैं। यद्यपि हम आपके द्वारा उत्पन्न प्राणी हैं, किन्तु हम प्रकृति के तीन गुणों के प्रभाव में एक के बाद एक जन्म लेते हैं, और इसी कारण हम अपने कर्म में पृथक-पृथक होते हैं। इसलिए, सृष्टि के बाद हम आपके दिव्य आनंद के लिए मिलकर कार्य नहीं कर सके।
O Adi Purusha, therefore we belong to You alone. Although we are beings born of You, yet we are born one after another under the influence of the three modes of nature, and therefore we are separate in our actions. Therefore after creation we could not act together for Your transcendental bliss.
तात्पर्य
ब्रह्मांड का निर्माण भगवान की बाहरी शक्ति के तीन गुणों के प्रभाव में काम कर रहा है। विभिन्न जीव भी उसी प्रभाव में हैं, और इसलिए वे भगवान को संतुष्ट करने में एक साथ काम नहीं कर सकते। इस विविध गतिविधि के कारण, भौतिक दुनिया में कोई सामंजस्य नहीं हो सकता है। इसलिए, सबसे अच्छी नीति भगवान की खातिर काम करना है। इससे मनचाहा सामंजस्य आएगा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥